Tuesday, 28 January 2014

chup chup ke hindi geet ,छुप छुप के - कविता ,prem geet , hindi poem for love

                 

तुम मुझको कभी देखो , छुप छुप के ज़माने से ,
फिर मै भी तुम्हे देखूं , छुप छुप के ज़माने से,

मेरा दिल नहीं डरता है , तुझे मिलने आने से ,
मेरा दिल तो धड़कता है , इक़रार नामे से ,

जब तक बचाना चाहो , तुम बच लो ज़माने से 
एक दिन तुम आओगे , बच बच के ज़माने से ,

गुलज़ार है दिन होता , तेरे हंसाने हँसाने से ,
चंदा भी शरमाये , तेरे मुस्कुराने से ,

तेरा देख ग़दर यौवन ,मेरा वक़्त ठहरने से ,
दीदार करूं हर पल , बिना डरे ज़माने से ,

कहीं चूक न जाना तुम , मुझपर निशाने से ,
कही रह न जाओ तुम ,मुझे आजमाने से ,

तेरे इश्क़ में डूबा सुनील ,लिखता है तराने से ,
मेरी गीत ग़ज़ल बन जा ,तुझे  जप लूं माले से ,

मै एक शहंशाह हूँ ,आशिक घराने से,
बन कर आजा बेग़म ,अपने आशियाने से .



Sunday, 19 January 2014

जीवन संघर्ष - poem on struggle of life , zero to hero

   

………  जीवन संघर्ष   .............

य कविता मेरे  बचपन के  मित्र चेयरमैन, डी एच  एल  इंफ्राबुल्स इंटरनेशनल प्रा ली  डॉ  संतोष सिंह जी को समर्पित है। .......

शाम का हल्का अँधेरा ,पंछियों का चहचाना ,
घाट  गंगा  के किनारे ,मौजों का साहिल पे गुनगुनाना ,
सूनी हवा रेतो  बीच, उल्टे कदमों के निशान ,
मै बढ़ रहा था सपने ले कर , छोड़ते  सीधे कदमों के निशान,
सुबह लोगों कि इबादत  से ,हुवे वो पाक तख़्त ,
बैठ उसपे नीले आसमाँ में सपने देख बीतता वक़्त ,
आवाज़ आ रही थी जैसे लहरे कह रही हो ,
सच होंगे सपने तेरे ,जैसे दुआ कर रही हों ,
तू रुक न कभी तू थक न कभी बस तू बढ़ाता चल ,
मेहनत तेरी रंग लाएगी मच जायेगी एक दिन हलचल ,
मन था विचलित विचारो से ,वो काल कठिन था मेरा बड़ा ,
 भूत भविष्य  वर्तमान का ,झंझावात  बन पहाड़ खड़ा ,
डगमग पे चला ,कर रगड़ झगड़ ,दिल में था बस वो लक्ष्यस्थल ,
मेरे कदम निगाहों से कहते ,है कहाँ छिपा वो कर्मस्थल ,
हर सुबह की  किरणो से पूछा ,क्या जन्म व्यर्थ ये जायेगा ,
पर मन में था विश्वास  कहीं एक सुन्दर अर्थ ही आएगा ,
कठिन वक्त था जाने कितने रिश्ते नाते छूटे ,
अपने हुवे पराये जनम के बन्धन  टूटे ,
अन्जाने  बन गए सगे , बन गया खून सा नाता ,
मै तो मन से सूफी था ,दिल से सब को अपनाता  ,
मकसद नहीं था मेरा ,सिर्फ अपना ही करू भला ,
दूजों का ग़म  देख भर आता है मेरा गला ,
वो सुबह कभी तो आयेगी ,मानवता धर्म निभा पाऊंगा ,
तब होगा जीवन अर्थ पूर्ण ,संघर्ष विराम को पाऊंगा  .......  

Thursday, 9 January 2014

कैसे कहूं - कविता , hindi poem relationship


                     ……… कैसे कहूं………


कैसे कहूं तुमको अपना ,
बुत पत्थर  के से रिश्ते है। 


दिल धूल सा बन पैरों पे गिरा 
तुम अंजानो से  मिलते रहे ,
कुछ भी न कहा क्या खता मेरी ,
बस ज़ख्मो पे मेरे हँसते रहे ,
कैसे कहूं तुमको अपना  ………। 



कई बरस सफर संग हमने किये 
सोचा था एक भरोसा है ,
मोड़ जहाँ अन्धा  आया ,
वही छोड़ दिया हमें सस्ते में ,
कैसे कहूं तुमको अपना  ………। 



मन गीली रेत सा बोझिल है ,
अरमान गिरा मेरा कटी पतंग ,
अब रिश्तों कि कोई उम्र नहीं ,
जज़बाती ठन्डे बस्ते में ,
कैसे कहूं तुमको अपना  ………। कैसे कहूं तुमको अपना  ……।