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Tuesday, 21 April 2015

poem on women's day , Chitthi kanya bhroon ki hindi kavita , पाती कन्या भ्रूण की- SOCIAL PROBLEMS OF GIRL CHILD, day BY SUNIL AGRAHARI

   

  

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....पाती कन्या भ्रूण की ..... (२२/०४/२०१५ )


         कन्या भ्रूण  की चिट्ठी है , कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ , कहती है 



मारते हो तुम क्यों मुझको ,
मैंने न बिगाड़ा कुछ तेरा ,
हम से तुम और  तुम से हम , 
कुछ भी  नहीं तेरा मेरा ,

अभी तो हमने की  तैयारी ,
 इस धरती पर आने को ,
आने से पहले ही तुमने  ,
दुश्मन किया  ज़माने को ,

छोटी बड़ी हर गलती  तेरी  , 
अपने आँचल से ढँकती  हूँ ,
धड़कन तेरी चलती रहे  , 
खून बन रगों मेंकर दौड़ती हूँ ,

न हूँगी मैं इस दुनियां में  ,
रिश्ता तुम किस्से निभाओगे ?
फसल लड़को की उगने को ,
वो ज़मीं कहाँ से लाओगे ?

मार के कन्या भ्रूण को ,
तुम भी ना  बच पाओगे ,
हम तो कहानी बन जाएंगे , 
तुम  भी इतिहास बन जाओगे ,











Saturday, 20 September 2014

Poem on women's life's , क्यों झुकायें सर- hindi kavita on women's day , women's problems. Sunil agrahari

  



 

**क्यों झुकायें  सर**१७ /०९/२०१४ 

(मेरी ये कविता समर्पित है सम्पूर्ण सम्मानित नारीयों की तरफ से उन  अत्याचारी पुरुषों को जो अपमानित करते हैं महिलाओं को )




हमी हम क्यों झुकायें सर,ये दुनियाँ भी हमारी है 
किसी की हम नहीं जागीर , इज़्ज़त भी हमारी है 
कभी डर छोड़ कर तुम भी रहो  ससुराल में आकर ,
करो सेवा ससुर और सास की खाना  तुम बना कर 
मगर हिम्मत नहीं पड़ती , रीतियों का आड़ लेते हो ,
दहेज़ के नाम पर बहुओं  को ज़िन्दा ही जलाते हो
पति की मौत पे नारी ही चिता में क्यों  जलती  है
करे बीवी के मरने पे जौहर , शौहर में ग़र हिम्मत है 
हमी हम क्यों झुकाये सर  ………… 

कभी कोठे पे बैठे हम ,कभी घर बर्तन मांजे हम ,

कभी न बन पाएं माँ या वारिस ना दे सके हम ,
बाँझ औरत कह के बेइज़्ज़त घर से भागते हो ,
कभी ऐसा  भी होता है दोष तुम्हरा होता  है
मगर वो दोष तुम्हारा भी मेरे हिस्से में होता है
अगर हिम्मत है तो ये इल्ज़ाम  ले लो सर 
हमी हम क्यों झुकाये सर  …………… 

टीका और सिन्दूर रखे व्रत परुषों  के खातिर ,

कभी तुम पहनो मंगलसूत्र , रखो व्रत महिला  के खातिर ,
शरम आती नहीं तुमको बल अबला पर दिखाते हो
मन्दिर में पूजा देवी की ,सड़क पे  बलात्कार करते हो ,
कभी तो समझो  इज़्ज़त , राखी ,करवाचौथ, माँ का प्यार 
नहीं तुम मर्द हो डरपोक शिकार औरत का करते हो
ना समझो  तुम के नारी है केवल भोग के काबिल ,
तुम्हारी हर मुश्किल में निकाल के रख देती अपना दिल ,
हमी हम क्यों झुकाये सर  ………

नहीं हिम्मत , करो तुम सामना ईमान से  किसी भी  नारी का ,

क्यों कि , हर इक कोने में सम्मान हो रहा है नारी का,
पहुँच गए चाँद तारों पे हम ,तुम्हें चूल्हा चक्की में दिखते हैं ,
नज़रे खोल के देखो हम ऊँचाई पर भी देखते है 
जहाँ के हर एक काम में, नाम हो रहा है नारी का ,
सदियों से रही आदत, किया अपमान नारी का,
परीक्षा अग्नि में सीता , सभा में द्रोपदी निर्वस्त्र,
छुपाते नाकामी अपनी , चलाते हो हमपे अस्त्र ,
हमी पर दाँव परीक्षा क्यों , हमी पर दाँव परीक्षा क्यों,
सहेगी अब नहीं नारी , सहेगी अब नहीं नारी , 
सोच पुराना सदियों का ,नहीं अब चलने वाला है,
चली अब तक है  पुरुषों की , जाग चुकी अब नारी है  ,
हमी हम क्यों झुकाये सर   ................ 

जौहर=पती  के मृत्यु के बाद (चिता में जलना )