Friday, 30 January 2015

hasya vyangya kaivta ,poem on politics chunavi mausam चुनावी मौसम - , during election time promises of leaders -funny poem

                 





    चुनावी मौसम

आ गया है चुनाव का मौसम ,
झड़ी वादों की लगने  लगी  है 
कोई नेता नहीं घर था आता 
अब बेवक्त घन्टी बजने लगी है ,

वादे पिछले हुवे   ना थे  पूरे 
फिर भी बेशर्मी से मुस्कुराते 
सड़ रहे उनके वादे पुराने 
बदबू  उनमे से आने लगी है
आ गया है चुनाव का मौसम  …………… 

दांत और बाल नेता जी  के नकली

लगते थे पोस्टरों में वो असली 
झूठ दुनियाँ से कब तक छुपाना 
जनता सब कुछ समझने लगी है 
आ गया है चुनाव का मौसम  ................... 

मरती है टैक्स भर भर के जनता 

बदले में उनको ठेंगा है मिलता 
(अब नेता जी  का टिकट है कटने वाला )-
जनता सोते से  जगने लगी है 
आ गया है चुनाव का मौसम  …………

नेक तेरे नहीं है इरादे 

वादे कर के मुकरते फिरते भागे 
पाप कर्म की हो तुम तो नुमाइश 
बात अब ऐसी होने  लगी है 
आ गया है चुनाव का मौसम  …………....... 

फण्ड जनता का तुमने डकारा 

शब्द बेईमान भी तुमसे हारा ,
वक्त तेरा बुरा  है आने वाला 
जनता दिन  तेरे गिनने लगी है 
आ गया है चुनाव का मौसम   ……………… 



click the link for "chunavi mausam" kavita 
 


Friday, 16 January 2015

poem on dog's faith वफ़ादारी (कुत्ता ) - hindi -wafadari

             






 ……वफ़ादारी (कुत्ता )-१५/०१/२०१५/......





सूनी राहों में न जाने किसे देख, चिल्लाता है रात भर ,
उसकी वजह से  ही तो  चैन से  सोते  है  परिवार  भर ,
प्यार से जब भी उसे देखा , लिपट जाता है  पैरों से 
लेकिन दोस्ती नहीं करता, कभी वो झटपट गैरों से ,
सेना से आम आदमी तक ,होती है  उसकी  पूछ  ,
नहीं वो छोड़ता कभी साथ , चाहे नीच हो या ऊँच ,
परहेज़ नहीं कुछ खाने से ,चाहे जूठा हो या सुच्चा ,
मिले फेंक के चाहे या बर्तन में, हर भोजन है अच्छा ,
कोई घूमे गाड़ी पे , कोई सड़क पे आवारा ,
किसी ने प्यार से चूमा , किसी ने ईंट से मारा ,
सब से ज्यादा मौत सड़को पे इनकी ही होती है 
कहानी और फिल्मो में चर्चा , इनकी भी होती है 
हिफाज़त और वफादारी गुण इनके है पैदाइशी,
लेकिन लोगो का है व्यवहार इनसे जैसे कोई वहशी,
नहीं आया इनमे कोई बदलाव , सदियों से आज तलक , 
इन्सां  ने  ना सीखा इनसे कुछ , बदल जाता है झपकते पलक,
हमारी दुनियां में इनकी , नहीं  है भागीदारी कम, 
वफ़ादारी इनसे सीखें   ,निभाएं ज़िम्मेदार हम   ……… 
  



Sunday, 11 January 2015

hasya vyangya kavita अध्यापक - funny hindi poem on teachers

          

   … अध्यापक  …… (व्यंग्य  ) १० /०१/२०१५ 

कोई गुरु कोई टीचर कोई अध्यापक कहता  है ,
तुम्हारे ज्ञान के कारण हर पैरेंट सर झुकता है 
मगर मन ही मन में औरों से इक बात कहता है 
नहीं बन पाता  कुछ पढ़ कर वही तो टीचर बनता है ,

हमारे समाज में आज भी टीचर बनना कोई बड़ा काम नहीं है , और पुरुष टीचर तो दया का पात्र माना जाता है और वहीं महिला टीचर मतलब लकी ड्रॉ , सब के लिये चाहे वो ससुराल हो या घर,
तो कहते है … 
बने महिलाएं जो टीचर तो कीमत उनकी बढ़ जानी  है,
बहू बनती कमाऊ वो , पती की जेब कटनी है ,
अगर पुरुष बने टीचर तो  गिनती उल्टी हो जानी है ,
करे जी फाड़ मेहनत वो, कहते ये काम अब जनानी है,

स्कूली  शिक्षा  में टीचर्स को चार भागों  में बांटा गया है , और पिछले जन्म के पापो के हिसाब से अलग -  उम्र के बच्चों के अध्यापक बनते है , NTT प्री प्राइमरी , PRT  क्लास 1 से 5 , TGT क्लास 6  से 8  और PGT क्लास 9  से 12 तक के बच्चों को पढ़ाते और उनकी समस्याओं से दो चार होते है
तो कहते है… 
बचपन में किया जो पाप  तो वो NTT  होता है 
लड़कपन में किया जो पाप तो वो PRT  होता है 
किया तरुणाई में जो पाप  तो वो TGT  होता है 
किया जो पाप बुढ़ापे में  तो वो पीजीटी  होता है 

स्कूल का सीस्टम जिन लोगो से  चलता  है उनके साथ खट्टे मीठे अनुभव रोज़ होते रहते है 
तो कहते है… 

जो आउट इन से होते चार्ज वही इंचार्ज होते है
करे मिस हेड के स्ट्रेस को वही हेड मिस्ट्रेस  होता है
पल पल जो करे प्रिंसिपल वो वाईस प्रिंसिपल  होता है ,.... और
 करे जो ऐज को मैनज वही मैनेजर होता है
करे हर बात पे टर  टर वही कोर्डिनेटर होता है ,
जिसे पल पल की रहती खबर वही तो प्रिसिपल होता है,

अरे ओ बच्चों माँ बाप  तुम्हे कुछ  पता भी होता है ,
इन्ही टीचर्स के  दम  पे समाज पढ़ा लिखा होता है ,
जिसे न मिले गुरु  वो अंगूठा छाप  होता है ,
मेरा तो काम है लिखना किसी को फर्क क्या पड़ता है 
कोई गुरु कोई टीचर    ………। 

Friday, 9 January 2015

Vyangya kavita , contemporary hindi kavita लाइन (line )व्यंग्य - hindi poem on line

            ***लाइन***  (line )व्यंग्य (९/०१/२०१५ )-३:४५ सांय काल 






हिंदी में कहते पंक्ति  और ,अंग्रेजी में कहते  लाइन 
शार्ट फॉर्म में कहते क्यू (Q )  और उर्दू  में कतार है लाइन
मेरे
पैदा होने से पहले हॉस्टपीटल में डॉक्टर से मिलने की लाइन 
जो हुवा पैदा तो स्वास्थ का टीका लगवाने की लाइन 
बड़ा  हुवा थोड़ा तो स्कूल में एडमिशन की लाइन ,
किया स्कूल में  एंटर तो मिली असेंबली की लाइन ,
क्लास की पढाई में आर्ट, जिऑमेट्री की लाइन ,
स्कूल पास कर कॉलेज में एडमिशन की लाइन ,

जो कॉलेज पास हुवा तो नौकरी  में interview की लाइन ,
नौकरी की देश में ,प्रमोशन हुवा विदेश  में  ,
विदेश जाने के खातिर पासपोर्ट बनवाने  की लाइन ,
बन गया पासपोर्ट तो मिली  वीज़ा की लाइन ,
एयरपोर्ट पे इंट्रेंस और लगेज की लाइन ,

टैक्सी और ऑटो  में बस में ट्रेन  में लाइन ,
सैलरी लेने बैंक गया तो मिली एटीएम में लाइन ,
गया जो रेस्टोरेंट में तो आर्डर डिलिवरी में लगा टाइम  ,
वेटर से पूछा इतना लेट क्यूँ  है ?
वो बोला साहब आप का आर्डर Q (line) में है 


सर्कस में खेल में मूवी हाल में लाइन 
राशन की दुकान पर लेने वालो की लाइन 
बिजली पानी बिल टैक्स जमा करने की  लाइन ,
कोर्ट कचेहरी जेल में मुजरिम की  बड़ी लाइन ,
मंदिर मस्जिद गुरुद्वार और चर्च में  भक्तों की लाइन ,
भंडारे और लंगर में भूखो की  लम्बी लाइन ,

रिटायर हुवा नौकरी से पेंशन लेने की लाइन ,

ज़िन्दगी के फेल पास में आई  मुकद्दर की  लाइन
हथेली पे किस्मत की नेपोलियन ने  खींची थी लाइन 
चक्कर में लाइन के खो गई अपनी ज़िन्दगी की शाइन ,

चला अन्तिम यात्रा पर चार कंधो पे होके  सवार ,
न पीछा छूटा लाइन का शमशान पे मिल गई फिर से कतार (LINE ) ,
ज़िंदा लोगो की लाइन में रहती थी बड़ी मारामार ,
ये तो मुर्दों की थी लाइन  , सब लेटे  थे पॉव पसार ,
जीवन है  समझो माझी , तो मानो पक्ति है पतवार ,
है डेरा लाइन का चारो तरफ , है  लाइन की कतार,
इन सीधी लाइनो में उलझा है  सारा संसार 
जीवन  पार न  होवे , बिना  लाइन पे हो  सवार   ....... 

Monday, 10 November 2014

Hasya vyangya , Poem on students , Chitthi chatra ki hindi funny poem , चिट्ठी छात्र की (व्यंग )- funny student's letter to the principal

 

     चिट्ठी  छात्र की   (व्यंग )


आदरणीय प्रधानचार्य जी ,
सुबह सुबह मीठी नींद छोड़ , करैले के स्वाद जैसा स्कूल
आने  का मन तो नहीं करता ,लेकिन 
मम्मी पापा के खातिर मन मार के आना पड़ता  है ,
स्कूल के  डस्टबिन बॉक्स की भूख
मेरा लंचबॉक्स मिटाता है , 
और मेरे पेट की भूख कैंटीन का खाना मिटाता  है ,और अहहह  जंक फ़ूड ने तो मेरे चटपटी जुबान पर 2bhk फ्लैट बना रखा है ,
मुझे पता है के  मै गलत कर रहा  हूँ
लेकिन क्या करूँ दिल के हाथों मजबूर हूँ 
यही  अच्छा लगता है.........  

मेरी हवा ख़राब होती है कसम से ,
UT , री टेस्ट , रेमिडियल से ,
क्लास टीचर , इन्चार्जेस और प्रिंसिपल सर , 
इनकी स्पीच लगते है पुराने फैशन के कपड़े से ,
इन सब से मन बड़ा भारी भारी हो जाता  है,
इसके लिए बाथरूम्स के वाटर टैप
क्लास रूम्स फैन ,डोर ,विन्डो ,डेस्क ,टेबल बेन्च
तोड़ना पड़ता है फिर कहीं जाकर मन हल्का होता है ,
मुझे पता है के  मै गलत कर रहा  हूँ
लेकिन क्या करूँ दिल के हाथों मजबूर हूँ 
यही  अच्छा लगता है , 

एक लम्बी सांस लेते हुवे    …………। 


                                  सच  बताऊँ पहली बार जब स्कूल ड्रेस देखा तो

मेरे फैशन का टायर ट्यूब पंचर हो गया था
देखने में बासी चौमीन सा ढीला ढाला लिकलिका सा 
जिसमे फैशन का दूर दूर तक कोई स्कोप नहीं था
रोज़ रोज़ देख उसको चढ़ जाता है चिकनगुनिया बुखार
मजबूरी में शर्ट कभी बाहर कभी अंदर
कोलर कभी ऊपर तो कभी नीचे ,और तो और 
पैंट कमर से गिरती हुई टांगनी पड़ती  है ,आप को क्या पता सर 
स्कूल ड्रेस इंट्रेस्टिंग बनाने के लिए नए नए रिसर्च करने  पड़ते  है
कभी कभी तो ये फैशन डिसास्टर सा लगता है सर ,
हमारे हेयर स्टाइल सारे टीचर्स की आँख में
 शनी ग्रह की तरह चुभते  है ,
ज़रा सा बढ़ा  नहीं के ट्रैफिक पुलिस की तरह
चालान करने चले आते है ,
पूछो मत बस उस समय पूरे तन बदन में 
आग की लहर सी दौड़ती है,
लेकिन कुछ कर नहीं सकता ,
मुझे पता है के  मै गलत कर रहा  हूँ
लेकिन क्या करूँ दिल के हाथों मजबूर हूँ 
यही अच्छा लगता है , 

दिवाली से पहले स्कूल में पटाखा बजाना

होली से पहले सब को रंग लगाना
assembly  में बाते कर हँसाना ,
क्लास बंक कर इधर उधर घूमना ,
गलत id  फेस बुक , व्हाटसअप chat करना
पढाई के समय फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजना 
मुझे पता है के  मै गलत कर रहा  हूँ
लेकिन क्या करूँ दिल के हाथों मजबूर हूँ 
यही  अच्छा लगता है , 
और हाँ अंत में कहना चाहूंगा ,थोड़ी बहुत कसर बची थी इधर उधर करने की ना ,
वो भी इस नए मरे डिस्पर्सल प्लान ने स्यापा डाल कर शंघाई किचेन, चावला जैसे हमारे वेल विशर के गैस चूल्हे को ठंडे कर दिए। 

आदरणीय  प्रधानाचार्य जी मै प्रतिज्ञा करता हूँ  की 
अभी  तक जो गलत काम अच्छा लगता है दोबारा नही करूँगा 
मै जानता हूँ के ये सही है मेरे भविष्य के लिए लेकिन 
ये मै नहीं कर पाऊंगा , फिर भी कोशिश करूँगा 
मुझे पता है के  ये सही है 
लेकिन क्या करूँ अच्छा  ही नहीं लगता है.......
 माफ़ करना सर   …धन्यवाद  




 चटोरे चिंचपोकले 
आप का आज्ञाकारी छात्र 











Wednesday, 15 October 2014

poem on zindagi , life's , हासिल ज़िन्दगी का , sunil agrahari






……  हासिल ज़िन्दगी का   ........... (१५ /१०/२०१४ )

सोचने बैठा जिंदगी के हासिल को

बहोत सोचा  तो पाया  वीरान  तन्हा  सूखे
रेत के साहिल को ,
जहाँ मेरे बीते वक़्त का सैलाब जा चुका था
और बचे रह गए  थे मेरे बीते  लम्हों के टुकड़े
जिन्हे जी  चुका  था  मै , वो मुझसे दूर थे  पड़े ,

उनमे कुछ  थे छोटे छोटे लम्हों  के टुकड़े 

जो थे  बहोत खुश और हँसीं 
जिन्हे मैं जी भी  न पाया  था भरपूर  
उनकी यादें अभी तक है बसी जैसे सुन्दर हूर ,
क्यों की हँसी लम्हों की  मियाद बहोत कम होती है  ,

वहीं पास में कुछ बड़े  बड़े

टुकड़े लम्हों के थे  पड़े,
वो  लम्हे थे   दुःख के, 
याद आये थे खुदा  उनको जीने  में,
लेकिन ख़ास   बात थी उन लम्हों  की 
उनको जीने के बाद जैसे सोना आग में तप कर
 कुंदन बन जाता है , मैं  भी मजबूत हो गया था ,
क्यों  की दुःख  मुसीबत ज़िन्दगी जीना सिखाती है 

वहीं थोड़ी दूर पर कुछ लम्हे थे बड़े उदास  ,

जिनमे मै  कुछ कर न पाया था ख़ास 
सिवाय  सोचने के ,
ऐसे लम्हे  छोटे बड़े के थे कई टुकड़े 
ये भरे थे इन्तज़ार  और उलझन से ,
 भारी थे  बड़े ये इसी लिए  
इनको बिताना बहोत मुश्किल होता है 
किसी इंसान के लिए ,  

अभी मै बात कर  ही रहा था के 

इन लम्हों  ने बताया 
जिस वक़्त आप थे सुखी 
कुछ लोग आप को देख कर थे बहोत दुखी 
और जिन लम्हों में आप थे बहोत दुःखी 
वहीँ कुछ लोग आप की हालत देख थे बहोत सुखी 
आज का इन्सान बड़ा अजीब है 
वो अपने दुःख का तो इलाज कर लेता है ,
असली मुसीबत तो तब होती है
"जब वो दुखी होता है 
किसी के सुखी होने से  "  ………

सुन कर लम्हों की बाते  लगा क्या यही कमाया मैंने ?????

लोगों की  वो हंसी  ,दिलासा , एहसान ,भरोसा एक धोखा  था  ?????,
यही हासिल है मेरे ज़िन्दगी का ????
फिर आज सोचने बैठा जिंदगी के हासिल को  ……… 









Wednesday, 8 October 2014

hindi poem on daughters , सहेजता हूँ , beti par hindi kavita ,sunil agrahari






… सहेजता हूँ ... (० ९ /१० /२०१४ )

 ये कविता मेरी बेटी  "ओलिव "जैसी  सभी बेटियों के माता पिता को समर्पित है , कुछ बातें निःशब्द  होती है
जिसको सभी माता पिता सिर्फ महसूस कर सकते है और कुछ बातों के लिए मुझको शब्द मिल गये  जिससे मेरी ये कविता बन गई ।  

सहेजता हूँ उसकी छोटी छोटी चीज़े 
ना जाने कब उसकी यादों में जीना पड़े  ,

निराशा का घेरा , निशा सा  अँधेरा ,
किरण आशा बन आई , रौशन सवेरा ,

टूटे खिलौनों की जागीरों का कुनबा है अब तक ,
बेवक़्त शोर  भोंपू  का कानों में है अब तक ,

रो कर आधी रातों  में बिस्किट मांगना ,
आधा खाना  फिर आधा पाऊडर बनाना ,

रोते  रोते  गिरना और गिर कर के हँसना ,
आँचल में माँ के छुपना छुपाना ,

ज़िद कर के बाते अपनी मनवांना 
तोतली जुबां  से शिकायतें लगाना ,

पीछे पीछे पापा की पूँछ बन टहलना ,
मेरी एक टॉफी से उसका बहलना ,

रूह खुश होती थी उसकी  मुस्कराहट से ,
रोना उसको आता था मेरी जाने की आहट से ,

वो जाना पहली बार स्कूल उसका ,
छोटे से कन्धे पर लटकता भारी बस्ता  ,

बेवजह  सवालों  की होती  थी बारिश ,
उसकी यादों के घरौंदों का मैं हूँ  इकलौता वारिस ,

क्या क्या बताऊँ क्या क्या संजोता हूँ 
उसके हर एक लम्हे को माले  में पिरोता हूँ 

होगी उसकी विदाई एक दिन मन मन ही रोता हूँ ,
करूँगा कन्या दान  ये सोच के खुश होता हूँ ,

सहेजता हूँ  .......  .......... 





Thursday, 25 September 2014

Poem on zindagi , relationship ,Maati aadam ki hindi poem , माटी - आदम की - hindi poem on human nature

  
Published in  Mauritius 
Magazine - Akrosh
January 19

   माटी - आदम की  ...... (२५ /०९/२०१४ )

ऐ ख़ुदा बदल दे माटी मेरे आदम की 
जिससे बनाता  आया है अब तक उसका जिस्म ,

ये माटी अब कच्ची सी लगती है ,
नहीं बर्दाश्त कर पाती ज़िन्दगी के छोटे बड़े सदमे,

जो मिलते है, देते है ,एक दूसरों को,
सगे, अपने, पराये और अन्जान से  ,
ऐ ख़ुदा बदल दे माटी   मेरे आदम की ……………… 

आप की माटी तो ऐसी ना थी 
जो दे किसी को धोखा ,
रिश्तों की थी इज़्ज़त 
 जैसे छत को दीवार पर भरोसा ,
ये कैसी माटी है ?
जिम्मेदारी की कमी सी इसमें आ रही  है ,
इस माटी में रिश्तों की मियाद खत्म सी  हो रही है ,
बड़ी जल्दी घुट रहा है दम रिश्तों का ,
दरारें  पड़ रही है ,
कई बार तो छूने से चिटक जा रही है 
हद तो होती है तब 
जब देखने मात्र से ही बिखर जा रही है 
ऐ ख़ुदा बदल दे माटी   मेरे आदम की ………………

एक रिश्ता भी बताये इन्सान

जिसका ना  हुवा हो अब तक अपमान  ?
छोटी छोटी बेजान चीज़ो के खातिर
ले लेता है आदम मसूमों की जान ,
सवाल ये नहीं की  इंसान मर रहा है ,
ये तो पैदा  होते ही हैं मरने के  लिए ,
मगर ये अपने पीछे छोड़ जाता  है " भाव" 
नए पैदा होने वालों के लिए ,
सवाल ये है की वो  "भाव"  जैसे ,
भरोसा ,रिश्ता,शिष्टाचार और अन्य भावों  का  
हो  रहा है क़त्ल और अपमान ,
खुद को ख़ुदा  समझ रहा इन्सान ,
तो आप के बनाये आदम का कैसे होगा  सम्मान   ? 
ऐ ख़ुदा बदल दे माटी   मेरे आदम की …………………

आप की माटी ऐसी तो न थी ,

ऐ खुदा आप से है इल्तज़ा ,
ख़त्म कर दे इस माटी के  सीलन की बू ,
भर दे इनमे पहली बरसात की सिली सोंधी माटी की खुशबू  ,  
दे दे माटी के सुराही का ठण्डा मीठा सा स्वभाव ,
जिसका हो रहा आप के आदम में अभाव ,
हो सके तो बदल दे अपने आदम की माटी
हो सके तो बदल  दे मेरे आदम की माटी 
ऐ ख़ुदा बदल दे माटी   मेरे आदम की …………………




Monday, 22 September 2014

poem on love , pyar , muhabbat , romantic memories यहीं हो





..यहीं हो    … २३ /०९/२०१४ 

लम्हा बासी भी  न हुवा था अभी उनके जाने के बाद ,
आई एक महकती मासूम मुलायम मखमली सी हवा 
छू कर मुझे सुबह सुबह समुद्र से निकलती अंजान 
कच्ची धूप की ताज़ी किरन सी उनकी याद ताज़ा करा गई 
उनका भोर में  अलसाया सा  चेहरा 
कमल नयन के किनारे लाल डोरे की नमी 
पीपल के पत्ते से  हवा में झूलते माथे पर बाल 
हरसिंगार के फूल की गुलाबी पंखुड़ी से गाल
और होंठ हो जैसे  उसकी डंठल केसरिया लाल 
आपस में एक दूसरे से शर्मा कर कह रहे हो 

काली घटा सी  गेसुओं में छुपा लो हमें
कही नज़र न लग जाये किसी की ,
खेत में रसीले गन्ने की खड़ी  फसल सी तरुणाई 

महुवे के फूल की मादक  खुशबू के नशे  में चूर 
उनके नाज़ुक बेल सी बाँहों में उलझ कर झूम रहा हूँ 
हाथो की उंगलियां मेरे बालों के बीच इस तरह फसी थी 
जैसे बेल की छोटी छोटी  जड़े पेड़ पर अपनी पकड़ बना  रही हों 
वो मेरा सरमाया है जो चारों तरफ  छाया है 
महसूस करता हूँ वर्तमान काल में 
जब की भूतकाल हो चूका है सब कुछ 
कैसे कहूँ की तुम नहीं हो....... तुम यहीं हो यहीं हो    ............. 

सांसों की ताल , अगन की तृप्ती 
तुम्हारे एहसास में बीते हुवे बिस्तर पर 
मेरे जिस्म के एक एक करवट का आराम हो, 
रात में तुम्हारे ख्वाब को जीने के बाद 
सुबह की अंगड़ाई का मीठा दर्द हो ,
मुमकिन नहीं तुम्हे याद न करूँ हर बार सोचता हूँ 
मगर क्या करूँ तुम मेरे स्वभाव में शामिल हो ,
तुम्हारे न होने के एहसास में 
होने को महसूस कर तिल तिल जी रहा  हूँ ,
ये मेरे मुहब्बत की पराकाष्ठा है 
के तुमपे  मर के ही जी गया हूँ 
कैसे कहूँ की तुम नहीं हो.......हैं  ?  तुम यहीं हो यहीं हो    ............. 

मेरे जिन्दगी का तिनका तिनका
तुम्हारे वफ़ा के जज़्बात के रौशनी से नहाया हुवा है 
और बर्फीली  झील के ठन्डे मीठे की सी 
तासीर  बस गई है बदन  के  रोम रोम में ,
करते हो इश्क़ जिस शिद्दत से
उसके सामने अपने आप को बौना पाता हूँ 
लेकिन इश्क़ इश्क़ होता है ,बस उसकी  अदा अलग होती है 
मुझे अच्छा लगता है तुम्हारे लिए 
मेरा  आवारापन  बंजारापन दीवानपन 
और सारी  दुनियां के लिए पागलपन 
खो रहा हूँ अपना वज़ूद 
तुम्हारे बिना मेरा होश तार्रुफ़ कराती है बेहोशी का  
मत निकालो मुझे इस दरिया से 
मैं  इसी में डूबना  चाहता हूँ 
क्यों की  तुम यहीं हो यहीं हो    ...........कैसे कहूँ की तुम नहीं हो.......