Friday, 26 June 2015

Motivational poem ,PRAYAAS HINDI POEM प्रयास- HINDI POEM ON HEARD WORK AND GOOD TRY

             ……… प्रयास …… (१५/०६/२०१५)  
SUNIL AGRAHAR 

मॉरीशस -प्रकाशित 
पत्रिका-आक्रोश 
जुलाई -2016 

बदकिस्मती से पंछी की चोंच से 
गिरा उन पत्थरों  के बीच ,
जहाँ पानी अब तक न पाया था 
किसी को सींच ,
मुझको अपना भविष्य 
दिख रहा था खतरे में ,
क्यों की मेरा वज़ूद जुड़ा था 
पानी के एक एक कतरे में ,
बादल बरसे बार बार  
और मैं हरपल करता इंतज़ार ,
एक बूँद कभी पानी की 
मुझे ले अपने आगोश में ,
मुझे इतिहास बनने से रोक ले 
मेरा वज़ूद रहे कायनात में ,
चलती है जब हवा बयार 
हिलता रहता हूँ बार बार ,
कि निकल पाऊँ इस अँधेरे कोने से ,
मैं भी जुड़ पाऊँ नीले आसमाँन से ,
इन्तज़ार और मेहनत रंग लाई ,
मुकद्दर से कुछ बूँद मुझ तक पहुँच पाई,
मैं तैयार हूँ आज अंकुरित होने को,
पत्थरों की ओट से सूरज की रोशनी पाने को ,
अब मैं अपने होने का एहसास कर सकता हूँ ,
बन के दरख़्त काम किसी के आ सकता हूँ ,
शायद ज़िन्दगी ऐसी ही है,
जिसको अपने हुनर और मुकद्दर से
जीती जा सकती है,
वर्ना ज़िन्दगी खो जाती है  
गुमनामी के अँधेरे में। 
   











Motivational poem ,KARMA HINDI POEM ON AIM , GOOD AND HARD WORK , कर्म BY SUNIL AGRAHARI







..........  कर्म ............(०९/०६/२०१५) 

मनुष्य हो कर्म पे, विश्वास तुम करो ,
मनुष्यता के धर्म को, ध्यान में धरो 
Music 
लक्ष्य के डगर पे  तुम ,अडिग, बने चलो 
सत्य की जुबां बनो ,इससे न टलो 
लक्ष्य है पुकारता ,ध्वनि को तुम सुनो 
परिस्थितियां विषम मगर ,इमांन को चुनो
Music 
धूप छाँव रात दिन का ,फर्क न पड़े 
मुस्कुराहटें कम ना हो ,आपदा पड़े 
आंधी पानी कुछ भी हो, रहो निडर खड़े
कदम ताल ना डिगे, सुरताल में बढ़े 
Music 
कमर कसो जीत का ,ताना बाना तुम बुनो,
नया गीत गुनगुनाओ, विजय धुन धुनों,
मंजिलों के बुर्ज़ पर आराम तुम करो ,
प्यार संग सब के रहो,नफ़रत न करो ,

जीत हो कैसी भी , गुरुर न करो ,
शपथ लो दृढ संकल्प, कर्म तुम करो।  

 सुनील अग्रहरि

Motivational poem ,HAUSALA HINDI POEM हौसला BY SUNIL AGRAHARI

 


 




... हौसला  …१६ /०५/२०१५ 

हिम्मत की हथौड़ी  हाथ में लो ,
अनवरत कार्य पे प्रहार करो ,
हौसला बन  ईट दर ईट 
इमारत में जुड़ जाने दो ,

मलाल न दिल में रहे कोई
न शिकायत अपने आप से हो ,
ऐसे करता वैसे करता 
न बाद में कुछ कहने को हो ,

काम नहीं आसान कोई 
दामन में कांटे उलझेंगे ,
परवाह नहीं करना इनकी 
ये तो भटकाने आयेंगे ,

मुकाम तुम्हे हासिल जब हो 
शुकराना सब का अदा करना ,
हर शख्स मील का पत्थर है 
 न कोई किसी से गिला रखना , 

बस मन में कर के दृढ़ विश्वास ,
आगाज़ करो आगाज़ करो ,
तुम रुको न लक्ष्य पाने तक ,
आलस का संघार करो ,

कोई साथ चले न चले तेरे 
अपने रहबर खुद बन जाओ ,
मंज़िल एक दिन खुद बोलेगी 
खुली है बाहें आ जाओ ,

हिम्मत की हथोड़ी हाथ में ले 
प्रहार करो बस प्रहार  करो  ....... 



Tuesday, 19 May 2015

Poem on politics , GHAR WAPSI HINDI POEM ON POLITICAL PARTIES , BAD POLITICS घर वापसी - SUNIL AGRAHARI

 

       
........घर वापसी.......(घर = धर्म )19/05/2015

यहाँ पर घर का मतलब है धर्म , घर वापसी मतलब धर्म परिवर्तन या जिन्होंने धर्म बदल लिया था किसी भी कारण से उनको फिर पुराने  धर्म में वापसी के लिए प्रेरित करना और मैं क्या सोचत हूँ इस मुद्दे पर  वो इस कविता में है । 


कहते है करो घर वापसी,
रक्खा है तुम्हारे घर में क्या ?
इस घर से जाना  है इक दिन,
मौत से बढ़ कर सच है क्या ?कहते है करो घर … 

इक घर बताओ ऐसा जो ,

जिसमे कोई बीमार ना हो ,
घर में भीड़ बढ़ाने से,
बीमारी ठीक होगी क्या ?कहते है करो घर.…  

एक भी घर ऐसा नहीं ,

जहाँ लोग सुकूँ  से रहते हों ,
झाँक  ज़रा अपने घर में ,
देख सब चैन रहते है क्या ?कहते है करो घर.…

पहले से तेरे घर में है जो ,

तू दुःख उनके सुनता ही नहीं ,
दुजो के घर वापसी से ,
दुःख सब के दूर होंगे क्या ?कहते है करो घर.…

पहले ही तेरे घर में , 

कितने भूखे बैठे हैं ,
उनका खाना मुझको  दे ,
उनको भूखा मरेगा क्या ?कहते है करो घर.…

हर बारिश में कितने सर ,

बिन छत के गीले होते हैं ,
पहले उनको छत  देदे,
फिर देखूँ  तेरे घर है क्या ,कहते है करो घर.…

हर घर में बच्चे गली गली ,

निर्वस्त्र घूमते फिरते  हैं 
पहले उनके तन ढक दे ,
फिर देखूँ मुझे पहनाओगे क्या ?कहते है करो घर.…

खुद सन्यासी बन बैठे ,

जनता को फरमान दिया ,
छै बच्चे पैदा करो 
एक से घर का होगा क्या ?कहते है करो घर.…

ऐसे घर गद्दारों को ,

घर वाले ही रुसवा करें ,
ऐसी घटिया सोच से ,
घर का भला हुवा है क्या ?कहते है करो घर.…

सब के घर एक से है ,

सब के सुख दुःख एक से है ,
समस्या तो हमारी सोच में है ,
घर बदल के होगा क्या ?कहते है करो घर.…












Monday, 18 May 2015

POEM ON NEWS PAPER , AKHBAAR HINDI POEM ON NEWS PAPER BY SUNIL AGRAHARI

…अख़बार ....१८/०५/२०१५ 

मैं हूँ अख़बार ,मैं हूँ अख़बार ,
सब को सुबह रहता है मेरा इंतज़ार ,
मेरे बिन चाय का ज़ायका है बेकार,
मैं हूँ नाचीज़ लोग पढ़ते बार बार 

ज़मी के अंदर या ज़मी के बाहर ,
आसमां के अंदर या आसमां के बाहर ,
समुन्दर के अंदर समुन्दर के बाहर  ,
जंगल से तेंदुआ कैसे आया बाहर ,
मुझमे है छपती बाते हज़ार,
 मैं हूँ अख़बार ……

कहीं कोई भागा , गया कोई पकड़ा ,
ग़रीब और भूखे को चोर कह के पकड़ा ,
बिना बात के धक्का मुक्की और झगड़ा ,
घूसखोर साहब के घर छापा तगड़ा ,
खट्टी मीठी खबरों का मै  हूँ बाजार ,
 मैं हूँ अख़बार ……

कहाँ आई बाढ़ ,कौन  बह गया,
कहाँ आया भूकम्प ,कौन  दब गया।,
बरसात और सूखे से कौन मर गया ,
बिल्ली की गोद  में चूहा सो गया ,
सुख दुःख की खबरों का मै हूँ अम्बार , 
मैं हूँ अख़बार …… 

इंसान बिक गया मिट्टी के भाव में ,
मिट्टी बिक गई सोने के भाव में ,
जीरा बिक गया  हीरे के भाव में ,
पेट्रोल जल गया मंदी के भाव में ,
खबर पढ़ के मेरी, होती है टकरार ,
 मैं हूँ अख़बार ……

सत्ता विपक्ष में हूँ दोनों  का प्यारा ,
सरकारी ठेकों का मै हूँ पिटारा ,
विज्ञापन की दुनियाँ का मै हूँ सहारा ,
खबर सच छपे तो हिल गई सरकार ,
मैं हूँ अख़बार ……


फिल्मो के हीरो  हीरोइन की सूरत ,
चटपटी खबरें भी लोगों की ज़रूरत ,
फैशन के दुनियाँ की भूतों की मूरत ,
फोटो तो ऐसी की शकल है न सीरत ,
मनोरंजन की दुनियां से कराता सरोकार ,
मैं हूँ अख़बार ……


कहाँ कौन रूठा कहाँ कौन छूटा ,
गरीबों का खाना अमीरों का जूठा,
नेता को पीटा सर किसका फूटा  ,
सरकारी अफसर ठग फर्जी झूठा ,
खबरों में बिक जाता है गवाँर ,
मैं हूँ अख़बार ……

सोने चांदी का भाव चढ़ा कितना टूटा ,

कौन सी कंपनी ने ग्राहकों को लूटा ,
नकली माल बेच  जेल से कौन छूटा ,
ज़मीन किसने बेचा कर के वादा झूठा ,
खबर बिक रहे बिक रहा है बाजार 

मैं हूँ अख़बार ……मैं हूँ अख़बार ……

मैं हूँ अख़बार ……मैं हूँ अख़बार ……







Sunday, 17 May 2015

Vyngya kavita , Batton HINDI POEM ON BUTTON BY SUNIL AGRAHARI

    

            



...बटन ...१६/०५/२०१५  

बटन भी क्या  चीज़ है 
लगे कपड़े में तो तन ढकता  है,
टूट जाये जगह से तो इज़्ज़त पे आ बनता है ,
आज कल तो बटन का चलन कुछ ज्यादा है ,
सारी दुनियाँ बटन से चलने पर आमादा  है ,

गलत बटन दबाते ही मुसीबत खड़ी  होती है ,
बटनों की भी अपनी समस्या बड़ी होती है ,
बटन मरते दम  तक अपना काम करता है ,
अटके एक धागे से भी बटन इज़्ज़त बचाता  है ,

रिमोट का बटन तो घायल हो कर भी चलता है ,
कमजोर बैटरी अपनी सजा , बटन पे मढ़ता है ,
कम्प्यूटर कीबोर्ड खुलते ही पटापट पिटता है ,
बटन टूट जाये तो ऑपरेटर और भी पीटता है ,

लिफ्ट में तो उंगली बटन के मुँह में घुस जाती है ,
मिक्सी को थोड़ा राहत है रह रह के दबाई जाती है ,
ठाठ बाठ एटीएम बटन के ए. सी रूम में रहता है ,
पैसों के संग रहता है पर २४ घंटे  दबता है ,

जब आया मोबाइल तो बटनों पे आफत आई ,
सच्ची हो या झूठी पर दब के सब से बात कराई ,
एंड्रॉएड टच स्क्रीन शुभ दिन राहत ले कर आया ,
दबना दबाना दूर हुवा , छू कर ही काम चलाया ,

कीमत तो बटन की कपड़ो में ही होती है ,
क्यों की बटन की डोर इज़्ज़त से जुड़ी  होती है ,
वरना बटन हो ख़राब तो गाली है मिलती ,
ठीक हो बटन तो फुर्सत काम से नहीं मिलती ,
आने वाला वक़्त है बटन के लिए भारी ,
बटनों पे आ रही  है बड़ी ज़िम्मेदारी ,
छूने से काम होगा , चलेगी दुनियाँ सारी ,
क्यों की  ....  
इंसानो से जुड़ गई है अब किस्मत हमारी …।  
इंसानो से जुड़ गई है अब किस्मत हमारी …।  





Thursday, 23 April 2015

Poem on STONES , PAIN , sacchai , Patthar ka dard hindi kavita - HINDI POEM ON STONE's feelings BY SUNIL AGRAHARI

 

Published in Prayagraj
 Magazine- Amrit Prabhat 1980

patthar ka dard

ये एक छन्द मुक्त कविता है , इस कविता में पत्थरों की भावनाओं को मनुष्यों की भावनाओं से अहिंसा को जोड़ने की कोशिश की गई है  ……  पत्थर कहता है 

तराशो मुझे ,यूँ  ही पड़ा रहने  दो
राह  का पत्थर  हूँ ,यूँ ही  ठोकर खाने दो  
ग़र तराशोगे  मुझको  हथोड़े चलेंगे
पैरों के ठोकर की आदत पड़ी है ..........

वैसे तो ठोकर भी  अब सहा नहीं जाता
अभी कल की ही बात है..........
जाने किस्से चोट लगी ,बड़ी तेज़ चिंगारी उठी
सोचा चिल्लाऊं ,लेकिन आवाज़ ही नहीं निकली
सोचा, देखूं ,कहाँ चोट लगी है ?
देखते ही आँखों ने नम  होना चाहा
मगर ऑंखें, रेगिस्तान जैसे सुखी रह गई  ,

फिर अचानक याद  आई .......
हमारी जात में ऐसी सुविधा कहाँ ,
इसी लिए मजबूर हूँ ,लाचार हूँ  ,समझ में नहीं आता ,
रब ने हम पत्थरों से क्यूँ की बेवफाई
हम पत्थरों की जात में आवाज़ आंसू क्यों न बनाई ,
हम इसी में संतोष कर लेते ,
जिसने जैसा चाहा तोड़ा, जैसा चाहा फोड़ा ,
मगर हमने उफ़ तक ना किया , जवाब भी ना दिया ,
किसी को मरने काम भी मुझसे ही लिया ,
क्या करूँ .... हाथ ही नहीं है ……नहीं तो रोक लेता ,

सारी अहिंसा तो हम पत्थरों की जात में मिलेगी ,
वैसे हम लोगो को इसी बात का गर्व
और इसी बात का दर्द है ,
शायद इसी लिए हम लोग पत्थर कहे जाते है ,
अरे ओ ऊपर वाले ,
हम लोगो की थोड़ी सी अहिंसा मनुष्यों को दे देते ,
तो शायद ये मनुष्यों की ये हालत न होती ,
और हमें इनके थोड़े से आंसू दे देते 
तो शायद हम लोग भी रो कर जी हल्का कर लेते ,
तब शायद पत्थर होने का ग़म न होता   ………३ 



Tuesday, 21 April 2015

poem on women's day , Chitthi kanya bhroon ki hindi kavita , पाती कन्या भ्रूण की- SOCIAL PROBLEMS OF GIRL CHILD, day BY SUNIL AGRAHARI

   

  

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....पाती कन्या भ्रूण की ..... (२२/०४/२०१५ )


         कन्या भ्रूण  की चिट्ठी है , कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ , कहती है 



मारते हो तुम क्यों मुझको ,
मैंने न बिगाड़ा कुछ तेरा ,
हम से तुम और  तुम से हम , 
कुछ भी  नहीं तेरा मेरा ,

अभी तो हमने की  तैयारी ,
 इस धरती पर आने को ,
आने से पहले ही तुमने  ,
दुश्मन किया  ज़माने को ,

छोटी बड़ी हर गलती  तेरी  , 
अपने आँचल से ढँकती  हूँ ,
धड़कन तेरी चलती रहे  , 
खून बन रगों मेंकर दौड़ती हूँ ,

न हूँगी मैं इस दुनियां में  ,
रिश्ता तुम किस्से निभाओगे ?
फसल लड़को की उगने को ,
वो ज़मीं कहाँ से लाओगे ?

मार के कन्या भ्रूण को ,
तुम भी ना  बच पाओगे ,
हम तो कहानी बन जाएंगे , 
तुम  भी इतिहास बन जाओगे ,











Friday, 10 April 2015

Poem on women's day ,Bhookhe bhediye hindi kavita भूखे भेड़िये - HINDI POEM ABOUT WOMEN'S day poem , GENDER EQUALITY BY SUNIL AGRAHARI


      



…… भूखे भेड़िये  ...(१०/०४/२०१५) 












मह्फ़ूज़  न आबरू औरत  की ,.
हर कोने में मिलते है भूखे भेड़िये ,

गर्भ में भी हम महफूज़ नहीं ,
क़त्ल कर देते है भूखे भेड़िये ,

अस्मत  लुटती  हर उम्र में अब ,
तार तार इज़्ज़त करते  भूखे भेड़िये ,

हम खुल के जिए या पर्दे में रहे ,
निगाहों से बलात्कार करते भूखे भेड़िये ,

हर सोच में  इनके बसती  हवस ,
वज़ूद खोते  और रौंदते भूखे भेड़िये ,

तरस   बरबस  आता   इनपर ,
माँ बहनों के संग ये कैसे रहते भूखे भेड़िये ?,







Tuesday, 7 April 2015

हिन्दी उत्थान


                                          

हिन्दी उत्थान 




हिंदुस्तान का नाम आते ही , हमारे मानस पटल  पर , हिंदी भाषा अपने आप ही आ जाती है , क्यों की हिन्दी केवल भाषा ही नही  बल्कि  ये हमारी संस्कृति संस्कार और  सभ्यता  भी है,हिन्दी ने हमेशा से सभी भाषाओँ  का सम्मान किया है लेकिन आज स्वयं हिंन्दी की मान मर्यादा  दूसरे भाषाओँ के सामने दयनीय स्थति में  दिखाई देती है , ऐसा नहीं की हिन्दी कमज़ोर है दूसरी भाषाओं से बल्कि  हम लोग दूर  रहे है अपनी मातृ भाषा हिन्दी  से , देश  वर्षो से स्वतंत्र हो चुका है  लकिन  हमारी भाषा  हिन्दी  आज भी गुलामी की जंजीर में जकड़ी  हुई है, हिन्दी को सम्मान और आज़ादी  दिलाने के लिए हमें हमारी युवा पीढ़ी को जागरूक करने की ज़रूरत है   तभी देश को अपनी  भाषा मुखर और स्वतंत्र रूप से मिल पायेगी ................... 
उसी  श्रृंखला में "मीहू "( में आइ हेल्प यू ) संस्था , विद्यार्थियों  और अध्यापकों के लिए  हिन्दी  की सबसे प्रचलित  विधा  कविता  लेखन एवं  पाठन प्रतियोगिता का आयोजन कर रही है , जिससे उनके अंदर हिन्दी लिखने और पढ़ने में रूचि पैदा  हो और सर्वाँगीड़  विकास  हो सके। 
"मीहू" आपसे आग्रह  करती है की आप ज्यादा  से ज्यादा  संख्या में अपनी सहभागिता  निभा  कर  अपने देश और मातृ भाषा को ऊर्जावान बनाएं। 

मुख्य आकर्षण----

१) सभी प्रतियोगी  विद्यालय एवं विद्यर्थी को  सम्मान प्रमाण पत्र 
२) बाल कवि सम्मलेन में कविता पाठ 
३) चयनित कविता संकलन  प्रकाशन 
४) हिन्दी अध्यापक सम्मान 

नियम ----

१) कविता स्वरचित होनी चाहिए।  . 
२) कविता  स्वतंत्र भाव अभिव्यक्ति अर्थात  किसी भी शीर्षक पर आधारित हो सकती है। 
३)  हिन्दी भाषा सहयोग राशि  मात्र १०० रू। 

Saturday, 21 March 2015

, Mai nahi to kya hindi poem मैं नहीं तो क्या- HINDI POEM ABOUT FIRST TIME SCHOOL. GOING CHILD,



....* मैं नहीं तो क्या* ...... 

















एक माँ जब अपने बच्चे को पहली बार स्कूल भेजती है 
तब उसके मन में तमाम सवाल होते है "जैसे वो कैसे  रहेगा  खायेगा ,खेलेगा मेरे बिन , और वो बच्चे को 
पूरे भरोसे के साथ टीचर के पास भेजती है  मासूस करते हुए कहती है। … 


तुम जा रहे स्कूल संग मैं नहीं तो क्या ,




Tuesday, 17 March 2015

POEM ON ZINDAGI , LIFES PAR , Aashcharya hindi kavita , आश्चर्य- HINDI POEM ABOUT CHANGING OF LIFE STYLE AND VALUES

 

             




 ………* आश्चर्य * ……… १६/०३/२०१५ 


महसूस होता  है मुझको बचपन की याद ,
ख़त्म हुई न उसकी अब तलक  मियाद ,
देखा है पहले जब कोई  दुःखी  होता था ,
मोहल्ला सारा रिश्तेदार मिलने आता था ,
अब कोई होता है मरने की कगार पर 
पूछते  न हाल चाल लोग भूल कर ,
वक्त है न पास किसी के शोक मानाने का ,
चलन ख़त्म हो रहा है किसी की मिटटी में जाने का ,
बड़ा आश्चर्य होता है  ……



अपनापन ख़त्म या अपनों से ही मतलब ?
झांको गहराई में तो अपनों में भी गफलत ,
मतलबी हो गए है हम , या चुक  गई है संवेदना ? 
सुनाई नहीं  देती है  , किसी को किसी की वेदना ,
रोज़ रोज़ मौत को देख पढ़ सुन कर ,
मौत को देखने सुनने पढ़ने की आदत सी हो गई है 
मगर डरता है अपनी मौत से , औरों से क्या मतलब ,
बड़ा आश्चर्य होता है  ……

तो क्या हम साश्वत सत्य , "मृत्यु "को समझ रहे है ?

''गीता'' का ज्ञान तो यही कहता है ,
तो  क्या हम इतने परिपक्व  है ?
यानी  मातमपुरसी ,शोक संवेदन सब मित्थ्या है ?
नहीं  , ये "भावनात्मक ऊर्जा " मानवता है ,
और इसका अंत  नही होना  चाहिए
इन्सान कहलाने के लिए ,अनवरत चलना चाहिए,
वार्ना मनुष्य और पशु  में अंतर न रहा जायेगा ,
आश्चर्य शब्द का मानो वज़ूद ही ख़त्म हो जायेगा ,
ये सब देख पढ़ सोच समझ कर ,अब आश्चर्य नहीं होता ,
इन्सान अच्छे बुरे हालात से जल्दी कर लेता है समझौता ,
आश्चर्य पैदा करती थी  ,पहले हर छोटी सी बात ,
अब आश्चर्य नहीं होता  ,हो कैसी भी "बड़ी बात " ,
अगले ही पल हो जाती है वो  "छोटी सी बात "
आश्चर्य है के अब आश्चर्य ही नहीं होता  …… 













Monday, 16 March 2015

MAA GANGA माँ गंगा HINDI POEM KAVITA BY SUNIL AGRAHARI , ganga ji ki hindi kavita






   *  माँ गंगा *


आस्था का प्रत्यक्ष प्रमाण है माँ गंगा 
बहुत दिनों तक शायद ना रह पायेगा अब चंगा 
खुद को हम तार रहे , माँ गंगा को मार रहे ,
अपनी ही अर्थी से माँ को सजा दे रहे 
कैसी है आस्था कैसा है विश्वाश 
तिल तिल कर मर रही है माँ गंगा की आस 
गंगा ने मुक्ति दी पापों से ,दिया विशुद्ध निर्मल जल 
हमने दिया बदले में अजैविक रासायनिक कचरा मल 
फिर कहते है "गंगा तेरा पानी अमृत "
और वो अमृत अपना अस्तित्व बचाते हो रही  है मृत ,
हम लोग स्वान्तः सुखाय एवं संतुष्टि के आदि है
इसी लिए जाने अंजाने में प्राणधारा श्रोत रूपी गंगा को  
अपमानित कर मजबूर कर रहे है विलुप्त होने को , 

विडम्बना है 
मिलता है मुफ्त ,अमृत गंगा जल है ,
पर कीमत न मुफ्त की ,
स्वार्थी है हम लोग करते माँ से छल है,
सिखाती है अगर आस्था अमृत  विष करना ,
तो लानत है ऐसी आस्था पर जो ढकोसला मात्र है
धन्य है माँ गंगे ,तेरा निर्मल पवित्र ह्रदय विशाल है,
लेकिन प्रश्न ये है की ,
कब तक चलेगी  , इस  विशाल ह्रदय की  सांसों की डोर ,
अन्धी आस्था ,अन्ध विश्वास में लोग है भाव विभोर ,
मजबूत से ज्यादा इसे सब कर रहे  है कमज़ोर 
क्या हम तब जागेंगे जब गंगा मचाएगी शोर ?
ऐसा कभी न होगा क्यों की ,
गंगा त्याग का दूसरा नाम है,त्याग की मूर्ति तो होती है माँ 
माँ केवल  देती है लेती नहीं , इस लिए इसको कहते है गंगा माँ 
असल में हम आप प्रदूषित नहीं कर रहे गंगा को ,
हम अपवित्र प्रदूषित कर रहे है अपनी आस्था को ,
संस्कृति, विश्वास ,और  संस्कार को ,
आओ करे एक प्रण,
प्रदूषण से करे रण 
माँ को अविरल बहने दो
अमृत निर्मल रहने दो ।