Friday, 24 March 2017

Na soojha hindi poem by sunil agrahar - Hindi poem on views ,ज़िद , कविता -ना सूझा , poem on realty of life

           

  

 Published 

magzine - Jankaari kaal 

Delhi - February 21             

उम्र भर आँखे मसलता रहा 
मुसलसल चश्मा साफ़  करत रहा ,
न सूझा के धूल नज़रिये में है ,
इल्ज़ाम ज़माने पे लगाता रहा ,

ख़ुद को क़ामिल समझता रहा,
मशवरा मुफ्त सब को देता रहा  ,
न सुझा के महफ़िल की सुन लूँ  कभी ,
बेवजह तमाशा मैं बनता रहा ,

बेसबब बहस उनसे करता रहा ,
बातें मुकम्मल ,काटता मैं रहा ,
न सुझा के स्याह तो स्याह होता है ,
बारहा सोने को पीतल कहता रहा........ 

सुनील अग्रहरी 

मुसल्सल- लगातार 
क़ामिल  - सम्पूर्ण होना 
मशवरा  - सलाह 
बेसबब   - बिना मतलब 
मुकम्मल - सही बात 
बारहा     - कई बार,प्रायः     
   

 २४/०३/२०१७  












Wednesday, 22 March 2017

poem on samajik samsya , social issues JUNG POEM BY SUNIL AGRAHARI - जंग

   

****जंग  ****  poem on fight , poem on social issues ,jung                                                       


जंग की बहार है ,जंग की बहार है ,
तंग दिल हर तरफ़ तादाद बेशुमार है ,

छोटी मोटी बात पर लड़ाई आर पार है ,
दो दिलों के बीच खींची अहम् की दीवार है ,


जीत सिर्फ अपनी है दूसरों की हार है ,
सहन न कुछ भी पर प्यार की दरकार है ,

बाँटना ना कुछ भी बस लेने की गुहार है ,
पेट है भरा फिर भी खाने की मार है ,

सूफ़ी है सहमे और अताइयों के वार हैं,
नफरतों की धूप में मुरझा रहा प्यार है ,

दुश्मनी है खुल के ,सिकुड़ता सा प्यार है ,
इंसान अपनी जंग का खुद हो रहा शिकार है ....... 

23/03/2017 











Tuesday, 21 March 2017

Poem on life's , zindagi , NAGINE - BY SUNIL AGRAHARI - poem on relationship नागिनें




रूहानी रिश्ते 

*****नागिनें ***** 

ताउम्र इश्क करता रहा ,
उंगलियो पे सजे नागिनों से ,

ना समझा रूहानी रिश्तों को ,
जो बेशकीमती थे क़रीने से ,

रुखसत हुआ जहाँ से ,
असल नगीने 
सफ़ेद चोले  में जनाज़े से ,

आया चल कर उनके कन्धों पर ,
जिनको लगाया ना था कभी गले से ,

वो नागिनें पड़े थे मुझसे दूर ,
जो मेरे जिस्म के थे अजीज़ से ,

रिश्ते असल नगीने है,
समझा मैं बड़ी देर से ,

रिश्ते ही ज़िन्दा रहते है ,
सफ़ेद चोले में जनाजे से 
बाक़ी हैं ख़ाक से ,

सुना है मेरे कारवाँ में ,
ग़ैर थे बहोत करीब से ........

२१/०३/२०१७






रिश्ते करीब के 







Sunday, 29 January 2017

Poem on ANSOO, AWARA ANSOO POEM BY SUNIL AGRAHARI- ON TEARS आवारा आँसू

   published i Akrosh Magazin May 22

**आवारा  आँसू  **    


सुख दुःख तन्हाई के मौसम में, 
कोई आए  चाहे ना आए  ,
आँखों का घरौंदा छोड़ ज़रूर ,
आंसू आवारा आ जाते  हैं ,

आँखों के हंसी आशियाने में ,
ये छुप के बैठे रहते  हैं ,
ज़ज़्बात के इक आवाज़ पर ,
आंसू आवारा आ जाते  हैं,

दिल भारी उथल पुथल में हो ,
इनको न गवारा होता  है, 
जब तक दिल हल्का न होले  ,
आंसू आवारा बहते  हैं 

सूरते हाल बयाँ करते ,
हर ज़िंदा दिल की आँखों से,
रोक न पाता कोई जब ,
आंसू आवारा होते  हैं,  

आँखों से निकल कर गालो तक ,
मंज़िल बंजारों सी होती है ,
तासीर में गर्मी होती है ,
जब आंसू आवारा होते हैं ,

खुदगर्ज़ मिजाज़ हैं इनके ,
 ये वापस कभी ना जाते है ,
लम्बी यादें  दे जाते हैं,
जब आंसू आवारा होते  हैं...... ...... 29/01/17 





















Tuesday, 24 January 2017

Poem on zindagi , INTAZAM- Hindi poem on parenting, by sunil agrahari -इंतज़ाम



   
****इंतज़ाम ****                             

मेरी ये कविता उन माता पिता को समर्पित है,
जिनके बच्चे रोज़गार के सिलसिले में माता पिता से दूर रहते है .....            

औलादें  पैदा होती है ,                                                                                                                        
सारी कायनात खुश होती है ,
और****
उनकी परवरिश में कमर टूट जाती है ,
सोचते हैं  एक दिन, बुढ़ापे का सहारा बनेंगे ,
सुख दुःख के साथी बन कर रहेंगे ,
सोच कर*****
हमने फर्ज़ माँ बाप का चुका तो दिया ,
जैसे खुले पिंजरे में दाना बाहर रख दिया,
परिन्दों को मिला उनका आसमाँ ,हम हुए खाली,
तन्हा हुए घर कोने , अब अकेले मानते है दिवाली ,
और अब ये आलम है के ******
वो बच्चे  दूर से मज़बूरियों का रोते  है रोना  ,
फिर बाते बड़ी कर के सिखाते हैं जीना ,
तब एहसास हुआ माँ बाप को*****
"न करें फर्जअदाई , तो दीन से गए ,
और करें ,तो  दूर अपनी जान से गए,
जान कर अन्जाने में हम ,कैसा काम कर गए ,
हम तो अपनी ही तन्हाई का इंतजाम कर गए"********
२३/०१/२०१७ 



  




Thursday, 8 December 2016

poem for society , SAMRIDDH SAMAJ HINDI POEM , SAJAG NAGARIK HINDI POEM ,BY SUNIL AGRAHARI -समृद्ध समाज-SDGs # 17- poem on - Revitalize the global partnership for sustainable development by sunil agrahari

SDG SONG GOAL 17: PARTNERSHIPS FOR THE GOALS

Published in  Mauritius 
Magazine - Akrosh
February 17

 *******समृद्ध समाज *******

जब होगा ये सजग नागरिक ,
तब होगा समृद्ध समाज ,
कल पर नहीं टालना इसको,
हमें सोचना होगा आज। 

मानव का धर्म सत्य अहिंसा ,

विश्वास हमारा शान्ति में हो ,
जाति भेद रंग दूर करे हम, 
स्थापित हो संयुक्त समाज। 

श्रेष्ठ उत्थान ,भविष्य हो स्वर्णिम,
जन जन करे सामाजिक कार्य ,
सतत प्रयास से सफल बनेगा ,
सजग नागरिक , समृद्ध समाज। 

दृढ़ प्रतिज्ञ हों ,दिव्य मूल्य से ,
अन्तः उर  से  हो  आवाज़ ,
विलम्ब ना करना , आगे बढ़ना 
सजग नागरिक , समृद्ध समाज। 

स्नेह दया का मान रखे हम 
एक दूजे का रखे ध्यान 
सिद्धांत पुरातन नूतन जोड़ ,
निर्माण करें आदर्श समाज। 

अपना पराया सोच से हट कर 
प्रथम वरीयता समाज हो ,
प्रगति करे पर नैतिकता के संग ,
सजग नागरिक समृद्ध समाज। 

मानवता ही सम्प्रदाय हो 

प्रेम ईमान की भाषा हो ,
प्रेरणा लेकर आत्म संयम की,
निर्मित करे नवीन समाज। 

परोपकार में मन हो समर्पित ,

सब का हो हार्दिक सम्मान ,
देश प्रेम से प्रेरित हो कर ,
राष्ट्रहित में करे सब काज।  ८/१२/२०१६


सुनील अग्रहरि 
एल्कॉन इंटरनेशनल स्कूल 
मयूर विहार ,फेज़ -१ 
दिल्ली -९१ 
फ़ोन -011 47770777 
मोबाइल -07011290161 

विषय -जाति रंग सम्प्रदाय ,देश और भाषा का भेद भाव ना रखते हुए मनुष्य को आत्मसंयम की प्रेरणा  







Thursday, 29 September 2016

samajik samsya par hindi kavita , social issues , NAA BHOOLE -poem by sunil agrahari -on social media issues-ना भूले

   
***ना भूले ***        

वो भूख की आग में जलता रहा ,
कोई भूख न उसकी मिटा सका  ,
लोग मजामँ लगा कर देखते रहे ,
पर फोटो खींचना ना भूले ,

दुर्घटना की चोट से ,
वो सड़क पे मौत से लड़ता रहा , 
लोग खड़े  तमाशबीन रहे  
पर  फोटो खींचना ना भूले ,

वो नदी में डूबता बचता रहा 
चिल्ला के गुज़ारिश करता रहा ,
ज़िन्दगी बह गई पानी में ,
पर फोटो खींचना ना भूले ,

क़त्ल हुवा चौराहे पर सुनील 
वो जान की भीख मांगता रहा ,
लोग छुप के नज़ारा देखते रहे ,
पर फोटो खींचना  ना भूले ,

क्यों वेदना शून्य हो रहे हैं हम  ,
और मौत का तांडव देख रहे ,
एक कदम इन्सानियत बढ़ जाए ,
क्या पता कोई जान बच जाए,

कोई अमर नहीं इस दुनियां में ,
कुछ भी हो सकता किसी के साथ ,
ऐ मौत की फोटो खींचने वालों ,
डर उस मौत के मंज़र से ,
जब मौत के सामने तू होगा ,
कोई तेरी फोटो खींचेगा ,
सोच दिल पे तेरी क्या गुज़रेगी ,

 इंसानियत का काम क्या काम यही अब  ,
फोटो मौत की सोशल मीडिया पर भेजो,
" मौत की फोटो बनने से
 इंसानियत कहता है रोको "
लोगो की पसंद का क्या कहना
क्या देख रहे ,क्या दिखा रहे,
इंटरनेट की दुनियां में ,
मनोरंजन मौत से कर रहे,
घटना से न कोई सबक लेते
बस फोटो लाइक करते रहे , 
हैं बुरा वक़्त इंसानियत का ,
या बुरा वक़्त इन्सान का  ,
पहले चार कन्धों पर लाशें जाती थीं ,
अब एक कन्धा भी नहीं मिलता
मिलते हैं तो बस 
अन्जानी भीड़ में
 फोटो खींचने वाले।   (२६/०९ /२०१६)











Friday, 23 September 2016

Poem on ghamand , GUROOR -hindi poem by sunil agrahari - on ego arrogancy -गुरूर

        

******गुरूर*****     

हुवा जो दूर गुरुर से 
खुद से मुलाकात हुई 
सातवें आसमान पे रहने की,
आदत ही बदल गई ,
लगता था मुझको ,
सब कुछ का ज्ञान है ,
सिर्फ मेरा ही सम्मान है ,
और जो ना समझ पाया ,
उसमे  अपमान है ,
मेरे ही काम से आन बान शान है ,
कैसी ग़लतफ़हमी मैंने पाल रखी थी 
शेर के खाल में बिल्ली पाल रखी थी ,
ज़िन्दगी का मुझपर एहसान हो गया ,
वक़्त रहते  गलतियों का भान हो गया , 
खाली जगह ज़िन्दगी में रह गई है काफ़ी ,
मुझे ज़िन्दगी में बिछड़ो से मांगनी है माफ़ी ,
ऊँचाई पर न बैठना , रहता है डर गिरने का ,
ऊँची सोच रखना , रहता ना ग़म मरने का ,
सब का अंत आना है , सब कुछ यहीं रह जाना है ,
अहम की कश्ती को कम पानी में डूब जाना है ,
रहम के परिंदों को जीते जी तर जाना है ,
गुरूर का सुरूर तो एक दिन उतर ही जाना है ,
मैं मैं के गुरूर में तो बकरे को कट जाना है ,
वक़्त रहते संभलो ,
वर्ना क्या समझना और क्या समझाना है। 

 (२३/०९/२०१६ )


Tuesday, 20 September 2016

Poem on bhrstachar , corruption , PATI DANA KI by sunil agrahari- hindi poem on bad policies problems , ODISA HOSPITAL DEATH CASE SUFFERER DANA .-पाती दाना की

  

****पाती दाना की *****(१५ /०९/२०१६ )





poem on social issues 




ऐ मेरे ज़िन्दगी के माझी दाना ,
उदास मत होना , न रोना ,
मुझे हर जनम में तुझको ही पाना 
जिन पढ़े लिखे सभ्य कहे जाने वाले दौलतमन्द 
लोगों से तू लगा रहा था गुहार ,
वो आज सब गए तुमसे हार ,
अनपढ़ है तू ,लेकिन इल्म है तुझे इंसानियत का ,
जो शायद उनके पास नहीं ,
ग़रीब है तू ,लेकिन प्यार की  दौलत बेशुमार है तेरे पास ,
जो शायद उनके पास नहीं ,
वो दौलत के पुजारी , मुहब्बत करते है जिस्मानी ,
इन सब से जुदा तूने तो प्यार किया रूहानी ,
क्यों की 
मीलों चले पैदल ,कन्धों पे मुझे रख कर ,
मैं तो जी गई तेरे काँधो पे चल कर 
हिचके ज़रा  भी नहीं , थके ज़रा भी नहीं 
हौसला ना तेरा टूटा , जब धरा पर धरा ,
मुझे  ढोते ढोते  तू हो रहा था अधमरा ,
हर कदम आत्मविश्वास से पूरा था भरा ,
लोगो  की आँखों बातों से तू ना डरा ,
तेरी मुहब्बत के सामने ताजमहल ,
बौना लग रहा है , 
जो है इश्क की निशानी,
खामोश इंसानियत, कब्रिस्तान लग है ,
जो है ज़िन्दादिली की निशानी , 
तरसते है महलों वाले तेरे जैसे प्यार को ,
उनकी  ज़िन्दगी बीत जाती है , यार के दीदार को,
ऐ मेरे ज़िन्दगी के मांझी , तेरी कश्ती डूबी ,
पर कश्ती को मझधार में न छोड़ा ,
पतवार तू चलाता रहा ,रिश्ता ना तोड़ा ,
मुझे अब बड़ा सुकून है  ,
हमारी बेटी एक जिम्मेदार पिता की छाया 
में महफूज़ है ,
उसे मेरी कमी कभी भी महसूस न होगी ,
अगर हम गरीबी के जंगल में रहने वाले 
असभ्य जानवर जैसे प्राणी  है , 
तो कोई ग़म नहीं ,
लेकिन इंसानियत रुपी प्यार तो है ,
जो इन सभ्य शहरियों के पास नहीं,
धिक्कार है धिक्कार है धिक्कार है,
ज्यादा कुछ नहीं कहना , 
मेरे मांझी उदास मत होना ,
हर जनम में मुझे बस तेरा ही होना ..... 




Friday, 16 September 2016

WORLD MUSIC DAY SANGEET KAVITA -HINDI POEM ON FEELINGS ABOUT MUSIC -, INTERNATIONAL MUSCI DAY HINDI POEM KAVITA,,संगीत SANGEET SUNIL AGRAHAR

 
मॉरीशस 
प्रकाशित-आक्रोश पत्रिका 
मार्च अप्रैल 2017              

 ****संगीत ****
मैं हूँ शाम में , मैं हूँ भोर में ,
मैं हूँ सन्नाटे में ,  हूँ शोर में ,
मैं हूँ ख़ुशी में , मैं हूँ ग़म में ,
दीदार नहीं मेरा , रहता हूँ ग़ुम मैं ,
मैं हूँ शाम में , मैं हूँ भोर में..........

पंछियों के पंख ,फड़फड़ाहट के ताल में ,
लहरों के नृत्य कलरव,सागर नदी ताल में ,
बरसात की छोटी बड़ी ,बूंदों के ताल में ,
भूत हो भविष्य या , वर्त्तमान काल में ,
मैं हूँ शाम में , मैं हूँ भोर में............

इन्सानों  के स्वभाव में ,शब्दों के रसभाव में ,
सूरज की पहली ,किरण की अहसास में,
रात दिन चारों  ,प्रहर के आभास में ,
जीवन के हर क्षण , सुरीले  एहसास में ,
मैं हूँ शाम में , मैं हूँ भोर में.............

ख़ुदा के पास में , इबादत की आस में ,
सुन कर सुरीले गीत ,बन जाते हैं मेरे मीत ,
जी हाँ ,जी हाँ ,जी हाँ ,जी हाँ 
मैं हूँ संगीत मैं हूँ संगीत मैं हूँ संगीत 
मैं हूँ शाम में , मैं हूँ भोर में................


Saturday, 2 July 2016

Poem on zindagi , CHITAKTI RAAT BY SUNIL AGRAHARI - poem on night-चिटकती रात

*****चिटकती रात ***** 

आज  की रात कुछ चिटक सी गई थी ,
रात के अंधरेपन में 
कुछ दरारें सी दिख रही थी ,
पलकें आसपास होकर भी 
एक दूजे से जुदा सी लग रही थी ,
ज़ुबां की नमी भी अब 
रेगिस्तान सी सूखी  महसूस हो थी ,
मेरे अल्फ़ाज़ उस रेत में 
फंसे धंसे से लग रहे थे ,
उस सन्नाटे में मेरी रूह ज़ोर ज़ोर  
से अजान दे रही थी,
मगर सुनने वाला कोई नहीं था यहाँ ,
ख़ामोशी में  डूबा था सारा जहाँ ,
किससे करुँ अपने हालात बयां ,
बेकाबू घोडा सा हो रहा था  समां ,
लगाम मेरे हाथों से छुटी जा रही थी ,
बेलगाम सी ज़िन्दगी हुई जा रही थी ,
मेरे गीत लग रहे थे जैसे रुदाली ,
भरे हुए प्याले लग रहे थे खाली ,
उलझनों के सैलाब में 
डूब रहा था सारा मंज़र ,
हर एक करवट चुभ रहा था जैसे खंज़र ,
अब रात के सियाही  में 
फीकापन आ रहा था ,
गीली आँखों में अब सूखपन सा छा रहा था ,
आँखे ढूंढ रही थी सूरज की  रोशनी को ,
बेताब थी पलके रात के पल समेटने को ,
किसी की आँखों में आस भर सकूं ,
ख़ामोशी की चारदीवारी में शोर भर सकूं ,
मेरी ईद के रोज़े को इंतज़ार है इफ़्तार का ,
ठहरी हुई ज़िन्दगी को इंतज़ार है रफ़्तार का  ................  

२४ /०६/२०१६ - २ बजे रात 



Poem on zindagi life's , KOSHISH hindi poem BY SUNIL AGRAHARI-कोशिश


 

Published in  Mauritius 
Magazine - Akrosh
February 18

*****कोशिश ***** poem on try , positivity 

पंछियों की तरह झूठ बोले बिना ,
एक दिन तो  रहे आओ कोशिश करें ,

नदियों की तरह पानी खुद ना पिए ,

नीर प्यासों को दे ,आओ कोशिश करें ,


पत्थरों की तरह  हर मज़हब में रहे,

सब को सज़दा करें ,आओ कोशिश करें ,

धूप में खुद दरख़्त ,सब को छाया दिए ,

सब की छाया बने ,आओ कोशिश करें 

याद ईसा को कर ,माफ़ सब को करें ,

माफ़ कर ,माफ़ी मांगे ,आओ कोशिश करें 


घास  के जैसे मिट्टी से जुड़ कर रहें ,

पावँ ज़मी पर रहें ,आओ कोशिश  करें ,   

१८/०६/२०१६ - १२ बजे रात





Tuesday, 14 June 2016

Poem on zindagi , AYA HUN POEM BY SUNIL AGRAHARI - HINDI POEM ON HELPING OTHERS AND POSITIVITY -आया हूँ



****आया हूँ*** 
                                                                                                                   
                                                                                                               
दो कदम तुम चलो ,चार हम भी चले ,
तुमसे कन्धा मिलाने आया हूँ मैं ,

तेरी खुशियों से मुझको मतलब नहीं ,

बांटने तेरे ग़म को आया हूँ मैं ,

मुश्किलें है तेरी ,लड़ना तुझको ही हैं ,

हौसला बस तेरा बढ़ाने आया हूँ मैं ,

 इस जहाँ में ना रो , तन्हा ही तू ,

अश्क को पोछने तेरे,आया हूँ मैं ,

वक्त हो अच्छा तो ,साथ देते है सब ,

 गर्दीशी को निभाने तेरे, आया हूँ मैं ,

वो इन्सां ही क्या ,जिए खुद के लिये ,

 जीने दूजो के खातिर ,  आया हूँ मैं , 
१२/०६/२०१६--- रात २:३० बजे





Poem on zindagi , life's , BEWAJAH POEM BY SUNIL AGRAHARI -hindi poem on without any reason positivity and willingness-बेवजह

     
**** बेवजह****  
                                                                                                            
समझदार बन के , खामोश बैठे हो ,
बेवजह भी कभी मुस्कुराया करो ,

ग़र मतलब हो , घर से बाहर आते हो ,

बेवजह भी कभी निकल आया करो ,

काम की बाते तो हर वक़्त करते हो ,

बेवजह बातें करने भी कभी आया करो ,

ज़रूरत पर ही लोगो से क्यूँ मिलते हो ?

बेवजह भी कभी मिलने आया करो  ,

अपनों से तो गले तुम रोज़ मिलते हो ,

बेवजह के भी रिश्ते कभी निभाया करो ,

होशियार ज़िम्मेदार बड़े बनते हो ,

बेवजह बच्चों संग कभी खेला करो ,

ज़िंदा रहने के खातिर वजह ढूँढते हो ,

बेवजह ज़िन्दगी भी कभी जिया करो ,    १२/०६/२०१६ ---रात 2 बजे 

Poem on mukaddar, kismat, bhagya , ,CHALTA RAHA POEM by sunil agrahari -hindi poem on gambling , life struggle -चलता रहा

       

                                                                                                                 





****चलता रहा****


चाल पे चाल मैं यूँ ही चलता रहा ,
रात को दिन में तब्दील करता रहा,
ज़िन्दगी से जुआ खेलता ही रहा,
दूर बैठा था मुझसे मुकद्दर मेरा ,

वक़्त भी ये माजरा सब देखता रहा ,
खुल के शै , छुप के मात ,मैं चलता रहा ,
पलके बोझिल हुई , पर संभलता रहा ,
अपनी हिम्मत का परा ना गिरने दिया ,

जीतना मुकद्दर को , मेरा मकसद रहा ,
बिसात की चाल को मैं समझाता रहा ,
बिना वक़्त के मैं यूँ ही मात खाता रहा ,
आया वक़्त जब क़रीब ,शै मेरा हो गया ,


वक्त को साथ ले चाल चलता रहा ,
आहिस्ता आहिस्ता मैं जीत के करीब आ गया। 
  ०९/०६/२०१६  ---रात  १ बजे


Hindi kavita adhunikta par ,TARKKI hindi poem by sunil agrahari- on social progress and leaving our culture तरक्क़ी ( तंज़)






****तरक्क़ी ( तंज़)****

                                                                  तरक्की तो रोज़ हम करते जा रहे है,
कच्चे थे जो मकाँ अब पक्के हो रहे है,
छोटी  छोटी जगह पर मीनार बन रहे है ,
छोटे छोटे कमरों  में  सिकुड़ते जा रहे है ,
क्या खूब रोज़ हम तरक्की कर रहे है ,

बड़े बड़े मैदान  छोटे होते जा रहे है ,
घास मिट्टी कम ,पक्के फर्श बन रहे है , 
घास हटा असली , नकली  लगा रहे है,
कच्ची माटी से पैरों के , रिश्ते ख़त्म हो रहे है ,
क्या खूब रोज़ हम तरक्की कर रहे है , 

अपनी भाषा बोलने में शर्म  रहे है  ,
विदेशी भाषा में पी. एच. डी. कर रहे हैं ,
छोड़ अपनी संस्कृति पाश्चात्य  हो रहे है ,
अपनी ही सभ्यता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे है ,
क्या खूब रोज़ हम तरक्की कर रहे है ,

रिश्तों के मायने  ,रोज़ ग़ुम हो रहे है , 
सीमित भावनाओं से ग्रसित हो रहे है ,
बिना मतलब ही जज़्बाती हो रहे है ,
मज़हबी उन्माद से वक़्त सींच रहे है,
क्या खूब रोज़ हम तरक्की कर रहे है,

मिट्टी की सोंधी खुशबू से लोग  दूर हो रहे है ,
मिट्टी के खिलौने बच्चों से दूर हो रहे है ,
इस मिट्टी के खातिर तो केवल जवान मर रहे है ,
इस मिट्टी से जुड़े हुवे किसान मर रहे है ,
क्या खूब रोज़ हम तरक्की कर रहे है....3 
 ०८/०६/२०१६  रात 2 बजे 

poem on modern progress , social issues , tarakki