Sunday, 13 August 2017

TIRANGA azadi ka kavita - BY SUNIL AGRAHARI -hindi poem on national flag -तिरंगा

   




कह रहा तिरंगा ,मैं आज बड़ा खुश हूँ ,
देश की  सेवा में ,मे भी लगा हूँ 
कफ़न बनते बनते दुखी हो चुका हूँ ,
कुछ काम नया करने आज मैं चला हूँ,
वैसे तो सदियों से मैं बिकता रहा हूँ,
नेताओं दलालों सियासत में रहा हूँ
गद्दारो के वास्ते मैं विदेशों में बिका हूँ,
पर ग़रीबों के वास्ते आज बिकने चला हूँ,
ग़रीबों संग देश के चौराहे पे बिका रहा हूँ ,
मैं खुश हूँ गरीबों के काम तो आ रहा हूँ ,
लोग खरीद रहे शान से ,मैं शान से बिक रहा हूँ ,
कह रहा तिरंगा मैं आज बड़ा खुश हूँ ?......
पर समझ नहीं आता,
मैं कहाँ से ,किसके लिए आज़ाद हूँ ?

बेटियों को नोचते है आज़ाद ये दरिन्दे,
भूखे ग़रीब ग़ुलाम जैसे कैद में परिन्दे,
राज कर रही विदेशी आँग्ल भाषा, 
उपेक्षा की शिकार मेरी मातृ भाषा,
भूखा प्यासजिस दिन न कोई रहेगा,
अपनी छत के नीचे जब हर कोई रहेगा,
वतन का हर बच्चा जब स्कूल में पढ़ेगा,
हर गाँव प्रगति पथ पर जब आगे बढ़ेगा,
स्वास्थ्य सेवा जब हर जन को मिलेगा,
हर क्षेत्र में जब देशआत्मनिर्भर बनेगा 
भेद भाव मज़हब में जब खत्म होगा,
इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म होगा, 
जाति पात धर्म का न जब होगा दंगा,
प्रदूषण से आज़ाद जब होगी गंगा,
गर्भ वाली कन्या जब आंगन में बढ़ेगी,
स्वतंत्र आसमाँ में जब बेटियाँ उड़ेगी,
ये देश ही सब की जब होगी रियासत,
फ़िज़ूल बात पे बन्द जब होगी सियासत, 
देश से ऊपर जब कुछ भी ना होगा ,
देशवासी हिंदी में जब जय हिंद कहेगा,
आज़ादी का सूरज ये तब उदय होगा, 
देश में जनता का जब अन्त्योदय होगा, 
असल मे ये वतन तब आज़ाद होगा। 
असल मे ये तिरंगा तब आज़ाद होगा। 
असल मे ये तिरंगा तब आज़ाद होगा। 
 





 

१४/०८/२०१७


















Tuesday, 18 July 2017

Baki hai hindi shayri ,


  

*****बाकी हैं *****                               १९/०७/२०१७ 


वो झुका , और ना पहुंचा हाथ उनके पैरों तक ,तो क्या हुआ ,
खुश हूँ की चलो उनमे झुकने का सलीका अभी बाकी है ,


Thursday, 13 July 2017

Poem on pyaar love ,ARSE POEM BY SUNILAGRAHARI - intazar-अरसे

    



 


*****अरसे ****                                                                                     

  देखा नहीं  है जाने बीते कितने अरसे ,
झलक तो अब दिखला जा नैना बादल बरसे। 

सोचा था मिल जाओगे ,जब निकला घर से ,
मन उथल पुथल थम जायेगा मिलने भर से। 

कहा नहीं अब तक कुछ तुझसे लगता भय से ,                                         
ख्वाब ख्याल तेरा है मुझको लगता मय  से।                                                     

खबर तेरे आने की जैसे खिलते फूल से ,
सब कुछ भूल से भूला रहता हूँ मैं जैसे ,

कायनात से बातें कर तेरी, मन मेरा हरसे ,
चर्चा हो चहुँ और तेरी , दिल बोले मन  से ,

तड़प है कैसी प्यास नहीं बुझती है जल से ,
जबकी  हरपल जीता रहता तेरे जलसे ,

जिस पल तुझको जियूं न वो पल जैसे शूल से ,
उलझ सुलझ कर जुड़ा हूँ मैं तो तेरे मूल से।  

 @१०/०५/२०१४ 



Road safety hindi poem-.Traffic rules awareness poem , ट्रैफिक नियम हिन्दी कविता, सड़क सुरक्षा हिन्दी कविता

hindi poem on traffic rules 

Hindi poem on road safety 





**** ट्रैफिक नियम कविता ****
सड़को पे चलना है अगर 
ट्रैफिक नियम को मान लो 
ट्रैफिक नियम ना मानोगे तो 
जोखिम में जान मान लो 

रेड लाइट  देख कर तुम 
गाडी को अपने रोक दो ,
पीली पे गाड़ी स्टार्ट करो 
ग्रीन लाइट हो तो चल पड़ो 

ग़र तुम हो ज़ेब्रा क्रॉसिंग पर ,
तो इसके आगे मत बढ़ो ,
ग्रीन लाइट का इंतज़ार करो ,
पर रेड लाइट तुम न जम्प करो ,

ध्यान लगाओ ड्राविंग पर ,
फोन पे बाते मत करो ,
जल्दी बजी भूल कर ,
ओवरटेक करना छोड़ दो ,

बाए रस्ते पर चलो 
फुटपाथ का रास्ता छोड़ दो 
पीकर शराब मत चलो 
जीवन का खतरा टाल दो 

सर की सुरक्षा के लिए 
हेलमट को सर पे बान्ध लो 
कार  चलाना है अगर 
सीट बैल्ट को पहले बाँध लो 

गाड़ी को चलाते वख्त
सड़कों पे केवल ध्यान दो
अनहोनी को न दावत दो
मोबाइल को त्याग दो

जीवन ये अनमोल है 
ट्रैफिक नियम के बोल है 
सब की सुरक्षा के लिए 
ट्रैफिक नियम को मान लो         
                                                 रचना   @१  मार्च २०१२ 








Monday, 10 July 2017

Poem on politics , NETA JI -BY SUNIL AGRAHARI-Poem on politics -नेता जी

 





*****नेता जी ***** 

फ़क्र होगा आप को सूबे के नेता जो है 

फ़र्क पड़ता नहीं हमको मतदाता जो है ,

गर्व होगा आप को सूबे के मंत्री जो है,
शर्म आती है हमको आप पर  रियाया  जो है , 

ठाठ से  मिलने आते हो पांच साल बाद ,
काठ हम हो गए तुझसे मिलने के बाद ,  

११/० ७ /२०१७





Thursday, 6 July 2017




 *****मदद*****                                                  


एक अदद मेरी मदद कीजिये ,
मुझे अच्छा इंसान बना दीजिये। 



Solar energy song ,SAUR URJA POEM BY SUNIL AGRAHARI-FOR SOLAR ENERGY-सौर ऊर्जा एक कविता







SDG POEM GOAL # 7: AFFORDABLE AND CLEAN ENERGY

Energy is central to nearly every major challenge and opportunity.   










*****सूरज  *****    

सूरज से रिश्ता सदियों पुराना ,
अब सौर ऊर्जा से बन्धन निभाना 
वैकल्पिक ऊर्जा का है ज़माना 
इसे हर घर पहुँचाने को, हमने ठाना

जगमग हो जीवन घर घर हो रौशन,
चले पंखा रेडिओ और टेलीविज़न,
सोलर कूकर अब पकाता है खाना 
सोलर पावर को आसां  है  लगाना, 

किसानों की बिजली का सरल उपाय  
सौर पम्प से पानी , खेतों में आये ,
शुद्ध जल पीने को गावँ में  है लाना , 
ग्रामीण विकास सौर ऊर्जा से लाना , 

खेती फसल  को इससे सुखाते  ,
औद्योगिक बिजली भी इससे बनाते, 
कोल्डस्टोरेज गीज़र , इससे चलाना 
ये बेजोड़ है कुदरत का  खजाना ,  

पर्यावरण स्वस्थ सोलर से बनायें  ,
सोलर पवार बिजली से ,राष्ट्र जगमगायें  ,
कम खर्च लागत से है ,जन धन बचाना 
सुरक्षित स्रोतों ,की ओर है जाना ,  

गुणवत्ता मानक सौर यंत्रों की ,
जांच और परख कर, नाइस ही बनाते ,
सोलर सिस्टम की समस्या निवारण ,
नाइस के " सौर मित्रों" से ही करवाना , 

 ०६/०७/२०१७






  

Tuesday, 4 July 2017

environment SONG -पेड़

SDG POEM GOAL 13: CLIMATE ACTION

Climate change is a global challenge that affects everyone, everywhere.

            POEM " PED "FOR IMPOTENCE OF TREES 

          

******पेड़****** hindi poem on trees 

कितने प्यारे कितने सुन्दर 
हरे भरे हैं पेड़ की छाया ,
पेड़ों से फल फूल है मिलते 
जो है सब के मन को भाया ,
पंछी ने घर घोसले 
पेड़ों पर ही बनाया ,
जंगल जानवर पेड़ों की 
माँ ने कहानी सुनाया ,
पेड़ है अनमोल धन 
जीवन इसमें समाया ,

HUNAR - hindi poem FOR skill BY SUNIL AGRAHARI -हुनर

        


 



*****हुनर *****        

तेरा हुनर जब से वख्त ने  पहचाना ,
हर शै शहर का हुवा तेरा दीवाना ,
तुझे छु कर बंज़र मिटटी हुई सोना 
पत्थरो में आस का  फूटा है झरना ,
शहर दर शहर बुत भी , तेरा दीवाना 
मिलने की चाह  में बस आगे बढ़ते जाना 
हर अदना बड़ा पत्थर, तुझपे नज़र टिकाये ,
क्या पता तेरा दिल, कब उनपर आ जाये 
पत्थरों की चिंगारी में ,दिल धड़क जाए ,
अखबारों में ये चर्चा खूब आम हो जाये
मिटटी की बदली जैसे ,उनकी भी बदल जाए 
नकारे से ये पत्थर, सोने में बदल जाए,
बस एक बार हाथ तेरा ,पत्थरो को छू जाए। 

१२ /०६/२०१७                                                                                   


LEADERSHIP HINDI POEM KYA BADHA -BY SUNIL AGRAHARI -TRUE LEADERSHIP POEM-क्या बढ़ा


GOAL 17: PARTNERSHIPS FOR THE GOALS

Revitalize the global partnership for sustainable development
                                                        


मेरी ये रचना पूर्व  प्रधानाचार्य  एवं वर्तमान निदेशक  श्रद्धेय श्री अशोक पाण्डे जी को सादर समर्पित है ,आज तक उनके व्यक्तित्व को जितना मैं अनुभव कर पाया हूँ उसकेअनुपात में मेरी रचना सूरज को दिया दिखने जैसा  है  ......


मै बढ़ा अकेले तो क्या बढ़ा ,ग़र मीत मेरा ना बढ़ा ,
                  
मैं खड़ा अकेले तो क्या खड़ा ,ग़र मीत  मेरा ना हुआ खड़ा 

है जीत मेरी जीत क्या , ग़र जीत न हो मेरे यार की 
विश्वाश अटल करते सब पर, ये जीत है उनके प्यार की 

जिस राह पे तन्हां मैं चला ,उस पर हो  मेरा हमराह भी 
मेरी हर सफलता तब सफल जब हो सफल मेरा यार भी 

मेरी हर विफलता भी सफल ,ग़र मीत ना हो उसपर विफल
मेरी हर सफलता भी विफल ,जब मीत मेरा हो विफल 

नित खोजते नई मंज़िले ,तरक्की दुनियाँ  के वास्ते ,
हर कोई आगे बढ़ सके , बनाते नित नए रास्ते ,

हो कारवां उस राह पे , जिस पथ पे चल के मै बढ़ा  
जीना नहीं निजता लिए ,हो वख्त कैसा भी आ पड़ा 

     ग़र मज़िलों के मुश्किलों में देखा मीत  को अड़ा 
           ख़ुद शून्य बन कर अंक संग ,बनाते अंक को है बड़ा          
                                                                             

                                                               sunil agrahari ५/६/२०१७   
                                                                         
                                                                             


Friday, 24 March 2017

Na soojha hindi poem by sunil agrahar - Hindi poem on views ,ज़िद , कविता -ना सूझा , poem on realty of life

           

  

 Published 

magzine - Jankaari kaal 

Delhi - February 21             

उम्र भर आँखे मसलता रहा 
मुसलसल चश्मा साफ़  करत रहा ,
न सूझा के धूल नज़रिये में है ,
इल्ज़ाम ज़माने पे लगाता रहा ,

ख़ुद को क़ामिल समझता रहा,
मशवरा मुफ्त सब को देता रहा  ,
न सुझा के महफ़िल की सुन लूँ  कभी ,
बेवजह तमाशा मैं बनता रहा ,

बेसबब बहस उनसे करता रहा ,
बातें मुकम्मल ,काटता मैं रहा ,
न सुझा के स्याह तो स्याह होता है ,
बारहा सोने को पीतल कहता रहा........ 

सुनील अग्रहरी 

मुसल्सल- लगातार 
क़ामिल  - सम्पूर्ण होना 
मशवरा  - सलाह 
बेसबब   - बिना मतलब 
मुकम्मल - सही बात 
बारहा     - कई बार,प्रायः     
   

 २४/०३/२०१७  












Wednesday, 22 March 2017

poem on samajik samsya , social issues JUNG POEM BY SUNIL AGRAHARI - जंग

   

****जंग  ****  poem on fight , poem on social issues ,jung                                                       


जंग की बहार है ,जंग की बहार है ,
तंग दिल हर तरफ़ तादाद बेशुमार है ,

छोटी मोटी बात पर लड़ाई आर पार है ,
दो दिलों के बीच खींची अहम् की दीवार है ,


जीत सिर्फ अपनी है दूसरों की हार है ,
सहन न कुछ भी पर प्यार की दरकार है ,

बाँटना ना कुछ भी बस लेने की गुहार है ,
पेट है भरा फिर भी खाने की मार है ,

सूफ़ी है सहमे और अताइयों के वार हैं,
नफरतों की धूप में मुरझा रहा प्यार है ,

दुश्मनी है खुल के ,सिकुड़ता सा प्यार है ,
इंसान अपनी जंग का खुद हो रहा शिकार है ....... 

23/03/2017 











Tuesday, 21 March 2017

Poem on life's , zindagi , NAGINE - BY SUNIL AGRAHARI - poem on relationship नागिनें




रूहानी रिश्ते 

*****नागिनें ***** 

ताउम्र इश्क करता रहा ,
उंगलियो पे सजे नागिनों से ,

ना समझा रूहानी रिश्तों को ,
जो बेशकीमती थे क़रीने से ,

रुखसत हुआ जहाँ से ,
असल नगीने 
सफ़ेद चोले  में जनाज़े से ,

आया चल कर उनके कन्धों पर ,
जिनको लगाया ना था कभी गले से ,

वो नागिनें पड़े थे मुझसे दूर ,
जो मेरे जिस्म के थे अजीज़ से ,

रिश्ते असल नगीने है,
समझा मैं बड़ी देर से ,

रिश्ते ही ज़िन्दा रहते है ,
सफ़ेद चोले में जनाजे से 
बाक़ी हैं ख़ाक से ,

सुना है मेरे कारवाँ में ,
ग़ैर थे बहोत करीब से ........

२१/०३/२०१७






रिश्ते करीब के 







Sunday, 29 January 2017

Poem on ANSOO, AWARA ANSOO POEM BY SUNIL AGRAHARI- ON TEARS आवारा आँसू

   published i Akrosh Magazin May 22

**आवारा  आँसू  **    


सुख दुःख तन्हाई के मौसम में, 
कोई आए  चाहे ना आए  ,
आँखों का घरौंदा छोड़ ज़रूर ,
आंसू आवारा आ जाते  हैं ,

आँखों के हंसी आशियाने में ,
ये छुप के बैठे रहते  हैं ,
ज़ज़्बात के इक आवाज़ पर ,
आंसू आवारा आ जाते  हैं,

दिल भारी उथल पुथल में हो ,
इनको न गवारा होता  है, 
जब तक दिल हल्का न होले  ,
आंसू आवारा बहते  हैं 

सूरते हाल बयाँ करते ,
हर ज़िंदा दिल की आँखों से,
रोक न पाता कोई जब ,
आंसू आवारा होते  हैं,  

आँखों से निकल कर गालो तक ,
मंज़िल बंजारों सी होती है ,
तासीर में गर्मी होती है ,
जब आंसू आवारा होते हैं ,

खुदगर्ज़ मिजाज़ हैं इनके ,
 ये वापस कभी ना जाते है ,
लम्बी यादें  दे जाते हैं,
जब आंसू आवारा होते  हैं...... ...... 29/01/17 





















Tuesday, 24 January 2017

Poem on zindagi , INTAZAM- Hindi poem on parenting, by sunil agrahari -इंतज़ाम



   
****इंतज़ाम ****                             

मेरी ये कविता उन माता पिता को समर्पित है,
जिनके बच्चे रोज़गार के सिलसिले में माता पिता से दूर रहते है .....            

औलादें  पैदा होती है ,                                                                                                                        
सारी कायनात खुश होती है ,
और****
उनकी परवरिश में कमर टूट जाती है ,
सोचते हैं  एक दिन, बुढ़ापे का सहारा बनेंगे ,
सुख दुःख के साथी बन कर रहेंगे ,
सोच कर*****
हमने फर्ज़ माँ बाप का चुका तो दिया ,
जैसे खुले पिंजरे में दाना बाहर रख दिया,
परिन्दों को मिला उनका आसमाँ ,हम हुए खाली,
तन्हा हुए घर कोने , अब अकेले मानते है दिवाली ,
और अब ये आलम है के ******
वो बच्चे  दूर से मज़बूरियों का रोते  है रोना  ,
फिर बाते बड़ी कर के सिखाते हैं जीना ,
तब एहसास हुआ माँ बाप को*****
"न करें फर्जअदाई , तो दीन से गए ,
और करें ,तो  दूर अपनी जान से गए,
जान कर अन्जाने में हम ,कैसा काम कर गए ,
हम तो अपनी ही तन्हाई का इंतजाम कर गए"********
२३/०१/२०१७ 



  




Thursday, 8 December 2016

poem for society , SAMRIDDH SAMAJ HINDI POEM , SAJAG NAGARIK HINDI POEM ,BY SUNIL AGRAHARI -समृद्ध समाज-SDGs # 17- poem on - Revitalize the global partnership for sustainable development by sunil agrahari

SDG SONG GOAL 17: PARTNERSHIPS FOR THE GOALS

Published in  Mauritius 
Magazine - Akrosh
February 17

 *******समृद्ध समाज *******

जब होगा ये सजग नागरिक ,
तब होगा समृद्ध समाज ,
कल पर नहीं टालना इसको,
हमें सोचना होगा आज। 

मानव का धर्म सत्य अहिंसा ,

विश्वास हमारा शान्ति में हो ,
जाति भेद रंग दूर करे हम, 
स्थापित हो संयुक्त समाज। 

श्रेष्ठ उत्थान ,भविष्य हो स्वर्णिम,
जन जन करे सामाजिक कार्य ,
सतत प्रयास से सफल बनेगा ,
सजग नागरिक , समृद्ध समाज। 

दृढ़ प्रतिज्ञ हों ,दिव्य मूल्य से ,
अन्तः उर  से  हो  आवाज़ ,
विलम्ब ना करना , आगे बढ़ना 
सजग नागरिक , समृद्ध समाज। 

स्नेह दया का मान रखे हम 
एक दूजे का रखे ध्यान 
सिद्धांत पुरातन नूतन जोड़ ,
निर्माण करें आदर्श समाज। 

अपना पराया सोच से हट कर 
प्रथम वरीयता समाज हो ,
प्रगति करे पर नैतिकता के संग ,
सजग नागरिक समृद्ध समाज। 

मानवता ही सम्प्रदाय हो 

प्रेम ईमान की भाषा हो ,
प्रेरणा लेकर आत्म संयम की,
निर्मित करे नवीन समाज। 

परोपकार में मन हो समर्पित ,

सब का हो हार्दिक सम्मान ,
देश प्रेम से प्रेरित हो कर ,
राष्ट्रहित में करे सब काज।  ८/१२/२०१६


सुनील अग्रहरि 
एल्कॉन इंटरनेशनल स्कूल 
मयूर विहार ,फेज़ -१ 
दिल्ली -९१ 
फ़ोन -011 47770777 
मोबाइल -07011290161 

विषय -जाति रंग सम्प्रदाय ,देश और भाषा का भेद भाव ना रखते हुए मनुष्य को आत्मसंयम की प्रेरणा  







Thursday, 29 September 2016

samajik samsya par hindi kavita , social issues , NAA BHOOLE -poem by sunil agrahari -on social media issues-ना भूले

   
***ना भूले ***        

वो भूख की आग में जलता रहा ,
कोई भूख न उसकी मिटा सका  ,
लोग मजामँ लगा कर देखते रहे ,
पर फोटो खींचना ना भूले ,

दुर्घटना की चोट से ,
वो सड़क पे मौत से लड़ता रहा , 
लोग खड़े  तमाशबीन रहे  
पर  फोटो खींचना ना भूले ,

वो नदी में डूबता बचता रहा 
चिल्ला के गुज़ारिश करता रहा ,
ज़िन्दगी बह गई पानी में ,
पर फोटो खींचना ना भूले ,

क़त्ल हुवा चौराहे पर सुनील 
वो जान की भीख मांगता रहा ,
लोग छुप के नज़ारा देखते रहे ,
पर फोटो खींचना  ना भूले ,

क्यों वेदना शून्य हो रहे हैं हम  ,
और मौत का तांडव देख रहे ,
एक कदम इन्सानियत बढ़ जाए ,
क्या पता कोई जान बच जाए,

कोई अमर नहीं इस दुनियां में ,
कुछ भी हो सकता किसी के साथ ,
ऐ मौत की फोटो खींचने वालों ,
डर उस मौत के मंज़र से ,
जब मौत के सामने तू होगा ,
कोई तेरी फोटो खींचेगा ,
सोच दिल पे तेरी क्या गुज़रेगी ,

 इंसानियत का काम क्या काम यही अब  ,
फोटो मौत की सोशल मीडिया पर भेजो,
" मौत की फोटो बनने से
 इंसानियत कहता है रोको "
लोगो की पसंद का क्या कहना
क्या देख रहे ,क्या दिखा रहे,
इंटरनेट की दुनियां में ,
मनोरंजन मौत से कर रहे,
घटना से न कोई सबक लेते
बस फोटो लाइक करते रहे , 
हैं बुरा वक़्त इंसानियत का ,
या बुरा वक़्त इन्सान का  ,
पहले चार कन्धों पर लाशें जाती थीं ,
अब एक कन्धा भी नहीं मिलता
मिलते हैं तो बस 
अन्जानी भीड़ में
 फोटो खींचने वाले।   (२६/०९ /२०१६)











Friday, 23 September 2016

Poem on ghamand , GUROOR -hindi poem by sunil agrahari - on ego arrogancy -गुरूर

        

******गुरूर*****     

हुवा जो दूर गुरुर से 
खुद से मुलाकात हुई 
सातवें आसमान पे रहने की,
आदत ही बदल गई ,
लगता था मुझको ,
सब कुछ का ज्ञान है ,
सिर्फ मेरा ही सम्मान है ,
और जो ना समझ पाया ,
उसमे  अपमान है ,
मेरे ही काम से आन बान शान है ,
कैसी ग़लतफ़हमी मैंने पाल रखी थी 
शेर के खाल में बिल्ली पाल रखी थी ,
ज़िन्दगी का मुझपर एहसान हो गया ,
वक़्त रहते  गलतियों का भान हो गया , 
खाली जगह ज़िन्दगी में रह गई है काफ़ी ,
मुझे ज़िन्दगी में बिछड़ो से मांगनी है माफ़ी ,
ऊँचाई पर न बैठना , रहता है डर गिरने का ,
ऊँची सोच रखना , रहता ना ग़म मरने का ,
सब का अंत आना है , सब कुछ यहीं रह जाना है ,
अहम की कश्ती को कम पानी में डूब जाना है ,
रहम के परिंदों को जीते जी तर जाना है ,
गुरूर का सुरूर तो एक दिन उतर ही जाना है ,
मैं मैं के गुरूर में तो बकरे को कट जाना है ,
वक़्त रहते संभलो ,
वर्ना क्या समझना और क्या समझाना है। 

 (२३/०९/२०१६ )


Tuesday, 20 September 2016

Poem on bhrstachar , corruption , PATI DANA KI by sunil agrahari- hindi poem on bad policies problems , ODISA HOSPITAL DEATH CASE SUFFERER DANA .-पाती दाना की

  

****पाती दाना की *****(१५ /०९/२०१६ )





poem on social issues 




ऐ मेरे ज़िन्दगी के माझी दाना ,
उदास मत होना , न रोना ,
मुझे हर जनम में तुझको ही पाना 
जिन पढ़े लिखे सभ्य कहे जाने वाले दौलतमन्द 
लोगों से तू लगा रहा था गुहार ,
वो आज सब गए तुमसे हार ,
अनपढ़ है तू ,लेकिन इल्म है तुझे इंसानियत का ,
जो शायद उनके पास नहीं ,
ग़रीब है तू ,लेकिन प्यार की  दौलत बेशुमार है तेरे पास ,
जो शायद उनके पास नहीं ,
वो दौलत के पुजारी , मुहब्बत करते है जिस्मानी ,
इन सब से जुदा तूने तो प्यार किया रूहानी ,
क्यों की 
मीलों चले पैदल ,कन्धों पे मुझे रख कर ,
मैं तो जी गई तेरे काँधो पे चल कर 
हिचके ज़रा  भी नहीं , थके ज़रा भी नहीं 
हौसला ना तेरा टूटा , जब धरा पर धरा ,
मुझे  ढोते ढोते  तू हो रहा था अधमरा ,
हर कदम आत्मविश्वास से पूरा था भरा ,
लोगो  की आँखों बातों से तू ना डरा ,
तेरी मुहब्बत के सामने ताजमहल ,
बौना लग रहा है , 
जो है इश्क की निशानी,
खामोश इंसानियत, कब्रिस्तान लग है ,
जो है ज़िन्दादिली की निशानी , 
तरसते है महलों वाले तेरे जैसे प्यार को ,
उनकी  ज़िन्दगी बीत जाती है , यार के दीदार को,
ऐ मेरे ज़िन्दगी के मांझी , तेरी कश्ती डूबी ,
पर कश्ती को मझधार में न छोड़ा ,
पतवार तू चलाता रहा ,रिश्ता ना तोड़ा ,
मुझे अब बड़ा सुकून है  ,
हमारी बेटी एक जिम्मेदार पिता की छाया 
में महफूज़ है ,
उसे मेरी कमी कभी भी महसूस न होगी ,
अगर हम गरीबी के जंगल में रहने वाले 
असभ्य जानवर जैसे प्राणी  है , 
तो कोई ग़म नहीं ,
लेकिन इंसानियत रुपी प्यार तो है ,
जो इन सभ्य शहरियों के पास नहीं,
धिक्कार है धिक्कार है धिक्कार है,
ज्यादा कुछ नहीं कहना , 
मेरे मांझी उदास मत होना ,
हर जनम में मुझे बस तेरा ही होना ..... 




Friday, 16 September 2016

WORLD MUSIC DAY SANGEET KAVITA -HINDI POEM ON FEELINGS ABOUT MUSIC -, INTERNATIONAL MUSCI DAY HINDI POEM KAVITA,,संगीत SANGEET SUNIL AGRAHAR

 
मॉरीशस 
प्रकाशित-आक्रोश पत्रिका 
मार्च अप्रैल 2017              

 ****संगीत ****
मैं हूँ शाम में , मैं हूँ भोर में ,
मैं हूँ सन्नाटे में ,  हूँ शोर में ,
मैं हूँ ख़ुशी में , मैं हूँ ग़म में ,
दीदार नहीं मेरा , रहता हूँ ग़ुम मैं ,
मैं हूँ शाम में , मैं हूँ भोर में..........

पंछियों के पंख ,फड़फड़ाहट के ताल में ,
लहरों के नृत्य कलरव,सागर नदी ताल में ,
बरसात की छोटी बड़ी ,बूंदों के ताल में ,
भूत हो भविष्य या , वर्त्तमान काल में ,
मैं हूँ शाम में , मैं हूँ भोर में............

इन्सानों  के स्वभाव में ,शब्दों के रसभाव में ,
सूरज की पहली ,किरण की अहसास में,
रात दिन चारों  ,प्रहर के आभास में ,
जीवन के हर क्षण , सुरीले  एहसास में ,
मैं हूँ शाम में , मैं हूँ भोर में.............

ख़ुदा के पास में , इबादत की आस में ,
सुन कर सुरीले गीत ,बन जाते हैं मेरे मीत ,
जी हाँ ,जी हाँ ,जी हाँ ,जी हाँ 
मैं हूँ संगीत मैं हूँ संगीत मैं हूँ संगीत 
मैं हूँ शाम में , मैं हूँ भोर में................