Friday, 24 March 2017

Na soojha hindi poem by sunil agrahar - Hindi poem on views ,ज़िद , कविता -ना सूझा , poem on realty of life

           

  

 Published 

magzine - Jankaari kaal 

Delhi - February 21             

उम्र भर आँखे मसलता रहा 
मुसलसल चश्मा साफ़  करत रहा ,
न सूझा के धूल नज़रिये में है ,
इल्ज़ाम ज़माने पे लगाता रहा ,

ख़ुद को क़ामिल समझता रहा,
मशवरा मुफ्त सब को देता रहा  ,
न सुझा के महफ़िल की सुन लूँ  कभी ,
बेवजह तमाशा मैं बनता रहा ,

बेसबब बहस उनसे करता रहा ,
बातें मुकम्मल ,काटता मैं रहा ,
न सुझा के स्याह तो स्याह होता है ,
बारहा सोने को पीतल कहता रहा........ 

सुनील अग्रहरी 

मुसल्सल- लगातार 
क़ामिल  - सम्पूर्ण होना 
मशवरा  - सलाह 
बेसबब   - बिना मतलब 
मुकम्मल - सही बात 
बारहा     - कई बार,प्रायः     
   

 २४/०३/२०१७  












Wednesday, 22 March 2017

poem on samajik samsya , social issues JUNG POEM BY SUNIL AGRAHARI - जंग

   

****जंग  ****  poem on fight , poem on social issues ,jung                                                       


जंग की बहार है ,जंग की बहार है ,
तंग दिल हर तरफ़ तादाद बेशुमार है ,

छोटी मोटी बात पर लड़ाई आर पार है ,
दो दिलों के बीच खींची अहम् की दीवार है ,


जीत सिर्फ अपनी है दूसरों की हार है ,
सहन न कुछ भी पर प्यार की दरकार है ,

बाँटना ना कुछ भी बस लेने की गुहार है ,
पेट है भरा फिर भी खाने की मार है ,

सूफ़ी है सहमे और अताइयों के वार हैं,
नफरतों की धूप में मुरझा रहा प्यार है ,

दुश्मनी है खुल के ,सिकुड़ता सा प्यार है ,
इंसान अपनी जंग का खुद हो रहा शिकार है ....... 

23/03/2017 











Tuesday, 21 March 2017

Poem on life's , zindagi , NAGINE - BY SUNIL AGRAHARI - poem on relationship नागिनें




रूहानी रिश्ते 

*****नागिनें ***** 

ताउम्र इश्क करता रहा ,
उंगलियो पे सजे नागिनों से ,

ना समझा रूहानी रिश्तों को ,
जो बेशकीमती थे क़रीने से ,

रुखसत हुआ जहाँ से ,
असल नगीने 
सफ़ेद चोले  में जनाज़े से ,

आया चल कर उनके कन्धों पर ,
जिनको लगाया ना था कभी गले से ,

वो नागिनें पड़े थे मुझसे दूर ,
जो मेरे जिस्म के थे अजीज़ से ,

रिश्ते असल नगीने है,
समझा मैं बड़ी देर से ,

रिश्ते ही ज़िन्दा रहते है ,
सफ़ेद चोले में जनाजे से 
बाक़ी हैं ख़ाक से ,

सुना है मेरे कारवाँ में ,
ग़ैर थे बहोत करीब से ........

२१/०३/२०१७






रिश्ते करीब के 







Sunday, 29 January 2017

Poem on ANSOO, AWARA ANSOO POEM BY SUNIL AGRAHARI- ON TEARS आवारा आँसू

   published i Akrosh Magazin May 22

**आवारा  आँसू  **    


सुख दुःख तन्हाई के मौसम में, 
कोई आए  चाहे ना आए  ,
आँखों का घरौंदा छोड़ ज़रूर ,
आंसू आवारा आ जाते  हैं ,

आँखों के हंसी आशियाने में ,
ये छुप के बैठे रहते  हैं ,
ज़ज़्बात के इक आवाज़ पर ,
आंसू आवारा आ जाते  हैं,

दिल भारी उथल पुथल में हो ,
इनको न गवारा होता  है, 
जब तक दिल हल्का न होले  ,
आंसू आवारा बहते  हैं 

सूरते हाल बयाँ करते ,
हर ज़िंदा दिल की आँखों से,
रोक न पाता कोई जब ,
आंसू आवारा होते  हैं,  

आँखों से निकल कर गालो तक ,
मंज़िल बंजारों सी होती है ,
तासीर में गर्मी होती है ,
जब आंसू आवारा होते हैं ,

खुदगर्ज़ मिजाज़ हैं इनके ,
 ये वापस कभी ना जाते है ,
लम्बी यादें  दे जाते हैं,
जब आंसू आवारा होते  हैं...... ...... 29/01/17 





















Tuesday, 24 January 2017

Poem on zindagi , INTAZAM- Hindi poem on parenting, by sunil agrahari -इंतज़ाम



   
****इंतज़ाम ****                             

मेरी ये कविता उन माता पिता को समर्पित है,
जिनके बच्चे रोज़गार के सिलसिले में माता पिता से दूर रहते है .....            

औलादें  पैदा होती है ,                                                                                                                        
सारी कायनात खुश होती है ,
और****
उनकी परवरिश में कमर टूट जाती है ,
सोचते हैं  एक दिन, बुढ़ापे का सहारा बनेंगे ,
सुख दुःख के साथी बन कर रहेंगे ,
सोच कर*****
हमने फर्ज़ माँ बाप का चुका तो दिया ,
जैसे खुले पिंजरे में दाना बाहर रख दिया,
परिन्दों को मिला उनका आसमाँ ,हम हुए खाली,
तन्हा हुए घर कोने , अब अकेले मानते है दिवाली ,
और अब ये आलम है के ******
वो बच्चे  दूर से मज़बूरियों का रोते  है रोना  ,
फिर बाते बड़ी कर के सिखाते हैं जीना ,
तब एहसास हुआ माँ बाप को*****
"न करें फर्जअदाई , तो दीन से गए ,
और करें ,तो  दूर अपनी जान से गए,
जान कर अन्जाने में हम ,कैसा काम कर गए ,
हम तो अपनी ही तन्हाई का इंतजाम कर गए"********
२३/०१/२०१७ 



  




Thursday, 8 December 2016

poem for society , SAMRIDDH SAMAJ HINDI POEM , SAJAG NAGARIK HINDI POEM ,BY SUNIL AGRAHARI -समृद्ध समाज-SDGs # 17- poem on - Revitalize the global partnership for sustainable development by sunil agrahari

SDG SONG GOAL 17: PARTNERSHIPS FOR THE GOALS

Published in  Mauritius 
Magazine - Akrosh
February 17

 *******समृद्ध समाज *******

जब होगा ये सजग नागरिक ,
तब होगा समृद्ध समाज ,
कल पर नहीं टालना इसको,
हमें सोचना होगा आज। 

मानव का धर्म सत्य अहिंसा ,

विश्वास हमारा शान्ति में हो ,
जाति भेद रंग दूर करे हम, 
स्थापित हो संयुक्त समाज। 

श्रेष्ठ उत्थान ,भविष्य हो स्वर्णिम,
जन जन करे सामाजिक कार्य ,
सतत प्रयास से सफल बनेगा ,
सजग नागरिक , समृद्ध समाज। 

दृढ़ प्रतिज्ञ हों ,दिव्य मूल्य से ,
अन्तः उर  से  हो  आवाज़ ,
विलम्ब ना करना , आगे बढ़ना 
सजग नागरिक , समृद्ध समाज। 

स्नेह दया का मान रखे हम 
एक दूजे का रखे ध्यान 
सिद्धांत पुरातन नूतन जोड़ ,
निर्माण करें आदर्श समाज। 

अपना पराया सोच से हट कर 
प्रथम वरीयता समाज हो ,
प्रगति करे पर नैतिकता के संग ,
सजग नागरिक समृद्ध समाज। 

मानवता ही सम्प्रदाय हो 

प्रेम ईमान की भाषा हो ,
प्रेरणा लेकर आत्म संयम की,
निर्मित करे नवीन समाज। 

परोपकार में मन हो समर्पित ,

सब का हो हार्दिक सम्मान ,
देश प्रेम से प्रेरित हो कर ,
राष्ट्रहित में करे सब काज।  ८/१२/२०१६


सुनील अग्रहरि 
एल्कॉन इंटरनेशनल स्कूल 
मयूर विहार ,फेज़ -१ 
दिल्ली -९१ 
फ़ोन -011 47770777 
मोबाइल -07011290161 

विषय -जाति रंग सम्प्रदाय ,देश और भाषा का भेद भाव ना रखते हुए मनुष्य को आत्मसंयम की प्रेरणा  







Thursday, 29 September 2016

samajik samsya par hindi kavita , social issues , NAA BHOOLE -poem by sunil agrahari -on social media issues-ना भूले

   
***ना भूले ***        

वो भूख की आग में जलता रहा ,
कोई भूख न उसकी मिटा सका  ,
लोग मजामँ लगा कर देखते रहे ,
पर फोटो खींचना ना भूले ,

दुर्घटना की चोट से ,
वो सड़क पे मौत से लड़ता रहा , 
लोग खड़े  तमाशबीन रहे  
पर  फोटो खींचना ना भूले ,

वो नदी में डूबता बचता रहा 
चिल्ला के गुज़ारिश करता रहा ,
ज़िन्दगी बह गई पानी में ,
पर फोटो खींचना ना भूले ,

क़त्ल हुवा चौराहे पर सुनील 
वो जान की भीख मांगता रहा ,
लोग छुप के नज़ारा देखते रहे ,
पर फोटो खींचना  ना भूले ,

क्यों वेदना शून्य हो रहे हैं हम  ,
और मौत का तांडव देख रहे ,
एक कदम इन्सानियत बढ़ जाए ,
क्या पता कोई जान बच जाए,

कोई अमर नहीं इस दुनियां में ,
कुछ भी हो सकता किसी के साथ ,
ऐ मौत की फोटो खींचने वालों ,
डर उस मौत के मंज़र से ,
जब मौत के सामने तू होगा ,
कोई तेरी फोटो खींचेगा ,
सोच दिल पे तेरी क्या गुज़रेगी ,

 इंसानियत का काम क्या काम यही अब  ,
फोटो मौत की सोशल मीडिया पर भेजो,
" मौत की फोटो बनने से
 इंसानियत कहता है रोको "
लोगो की पसंद का क्या कहना
क्या देख रहे ,क्या दिखा रहे,
इंटरनेट की दुनियां में ,
मनोरंजन मौत से कर रहे,
घटना से न कोई सबक लेते
बस फोटो लाइक करते रहे , 
हैं बुरा वक़्त इंसानियत का ,
या बुरा वक़्त इन्सान का  ,
पहले चार कन्धों पर लाशें जाती थीं ,
अब एक कन्धा भी नहीं मिलता
मिलते हैं तो बस 
अन्जानी भीड़ में
 फोटो खींचने वाले।   (२६/०९ /२०१६)











Friday, 23 September 2016

Poem on ghamand , GUROOR -hindi poem by sunil agrahari - on ego arrogancy -गुरूर

        

******गुरूर*****     

हुवा जो दूर गुरुर से 
खुद से मुलाकात हुई 
सातवें आसमान पे रहने की,
आदत ही बदल गई ,
लगता था मुझको ,
सब कुछ का ज्ञान है ,
सिर्फ मेरा ही सम्मान है ,
और जो ना समझ पाया ,
उसमे  अपमान है ,
मेरे ही काम से आन बान शान है ,
कैसी ग़लतफ़हमी मैंने पाल रखी थी 
शेर के खाल में बिल्ली पाल रखी थी ,
ज़िन्दगी का मुझपर एहसान हो गया ,
वक़्त रहते  गलतियों का भान हो गया , 
खाली जगह ज़िन्दगी में रह गई है काफ़ी ,
मुझे ज़िन्दगी में बिछड़ो से मांगनी है माफ़ी ,
ऊँचाई पर न बैठना , रहता है डर गिरने का ,
ऊँची सोच रखना , रहता ना ग़म मरने का ,
सब का अंत आना है , सब कुछ यहीं रह जाना है ,
अहम की कश्ती को कम पानी में डूब जाना है ,
रहम के परिंदों को जीते जी तर जाना है ,
गुरूर का सुरूर तो एक दिन उतर ही जाना है ,
मैं मैं के गुरूर में तो बकरे को कट जाना है ,
वक़्त रहते संभलो ,
वर्ना क्या समझना और क्या समझाना है। 

 (२३/०९/२०१६ )


Tuesday, 20 September 2016

Poem on bhrstachar , corruption , PATI DANA KI by sunil agrahari- hindi poem on bad policies problems , ODISA HOSPITAL DEATH CASE SUFFERER DANA .-पाती दाना की

  

****पाती दाना की *****(१५ /०९/२०१६ )





poem on social issues 




ऐ मेरे ज़िन्दगी के माझी दाना ,
उदास मत होना , न रोना ,
मुझे हर जनम में तुझको ही पाना 
जिन पढ़े लिखे सभ्य कहे जाने वाले दौलतमन्द 
लोगों से तू लगा रहा था गुहार ,
वो आज सब गए तुमसे हार ,
अनपढ़ है तू ,लेकिन इल्म है तुझे इंसानियत का ,
जो शायद उनके पास नहीं ,
ग़रीब है तू ,लेकिन प्यार की  दौलत बेशुमार है तेरे पास ,
जो शायद उनके पास नहीं ,
वो दौलत के पुजारी , मुहब्बत करते है जिस्मानी ,
इन सब से जुदा तूने तो प्यार किया रूहानी ,
क्यों की 
मीलों चले पैदल ,कन्धों पे मुझे रख कर ,
मैं तो जी गई तेरे काँधो पे चल कर 
हिचके ज़रा  भी नहीं , थके ज़रा भी नहीं 
हौसला ना तेरा टूटा , जब धरा पर धरा ,
मुझे  ढोते ढोते  तू हो रहा था अधमरा ,
हर कदम आत्मविश्वास से पूरा था भरा ,
लोगो  की आँखों बातों से तू ना डरा ,
तेरी मुहब्बत के सामने ताजमहल ,
बौना लग रहा है , 
जो है इश्क की निशानी,
खामोश इंसानियत, कब्रिस्तान लग है ,
जो है ज़िन्दादिली की निशानी , 
तरसते है महलों वाले तेरे जैसे प्यार को ,
उनकी  ज़िन्दगी बीत जाती है , यार के दीदार को,
ऐ मेरे ज़िन्दगी के मांझी , तेरी कश्ती डूबी ,
पर कश्ती को मझधार में न छोड़ा ,
पतवार तू चलाता रहा ,रिश्ता ना तोड़ा ,
मुझे अब बड़ा सुकून है  ,
हमारी बेटी एक जिम्मेदार पिता की छाया 
में महफूज़ है ,
उसे मेरी कमी कभी भी महसूस न होगी ,
अगर हम गरीबी के जंगल में रहने वाले 
असभ्य जानवर जैसे प्राणी  है , 
तो कोई ग़म नहीं ,
लेकिन इंसानियत रुपी प्यार तो है ,
जो इन सभ्य शहरियों के पास नहीं,
धिक्कार है धिक्कार है धिक्कार है,
ज्यादा कुछ नहीं कहना , 
मेरे मांझी उदास मत होना ,
हर जनम में मुझे बस तेरा ही होना ..... 




Friday, 16 September 2016

WORLD MUSIC DAY SANGEET KAVITA -HINDI POEM ON FEELINGS ABOUT MUSIC -, INTERNATIONAL MUSCI DAY HINDI POEM KAVITA,,संगीत SANGEET SUNIL AGRAHAR

 
मॉरीशस 
प्रकाशित-आक्रोश पत्रिका 
मार्च अप्रैल 2017              

 ****संगीत ****
मैं हूँ शाम में , मैं हूँ भोर में ,
मैं हूँ सन्नाटे में ,  हूँ शोर में ,
मैं हूँ ख़ुशी में , मैं हूँ ग़म में ,
दीदार नहीं मेरा , रहता हूँ ग़ुम मैं ,
मैं हूँ शाम में , मैं हूँ भोर में..........

पंछियों के पंख ,फड़फड़ाहट के ताल में ,
लहरों के नृत्य कलरव,सागर नदी ताल में ,
बरसात की छोटी बड़ी ,बूंदों के ताल में ,
भूत हो भविष्य या , वर्त्तमान काल में ,
मैं हूँ शाम में , मैं हूँ भोर में............

इन्सानों  के स्वभाव में ,शब्दों के रसभाव में ,
सूरज की पहली ,किरण की अहसास में,
रात दिन चारों  ,प्रहर के आभास में ,
जीवन के हर क्षण , सुरीले  एहसास में ,
मैं हूँ शाम में , मैं हूँ भोर में.............

ख़ुदा के पास में , इबादत की आस में ,
सुन कर सुरीले गीत ,बन जाते हैं मेरे मीत ,
जी हाँ ,जी हाँ ,जी हाँ ,जी हाँ 
मैं हूँ संगीत मैं हूँ संगीत मैं हूँ संगीत 
मैं हूँ शाम में , मैं हूँ भोर में................


Saturday, 2 July 2016

Poem on zindagi , CHITAKTI RAAT BY SUNIL AGRAHARI - poem on night-चिटकती रात

*****चिटकती रात ***** 

आज  की रात कुछ चिटक सी गई थी ,
रात के अंधरेपन में 
कुछ दरारें सी दिख रही थी ,
पलकें आसपास होकर भी 
एक दूजे से जुदा सी लग रही थी ,
ज़ुबां की नमी भी अब 
रेगिस्तान सी सूखी  महसूस हो थी ,
मेरे अल्फ़ाज़ उस रेत में 
फंसे धंसे से लग रहे थे ,
उस सन्नाटे में मेरी रूह ज़ोर ज़ोर  
से अजान दे रही थी,
मगर सुनने वाला कोई नहीं था यहाँ ,
ख़ामोशी में  डूबा था सारा जहाँ ,
किससे करुँ अपने हालात बयां ,
बेकाबू घोडा सा हो रहा था  समां ,
लगाम मेरे हाथों से छुटी जा रही थी ,
बेलगाम सी ज़िन्दगी हुई जा रही थी ,
मेरे गीत लग रहे थे जैसे रुदाली ,
भरे हुए प्याले लग रहे थे खाली ,
उलझनों के सैलाब में 
डूब रहा था सारा मंज़र ,
हर एक करवट चुभ रहा था जैसे खंज़र ,
अब रात के सियाही  में 
फीकापन आ रहा था ,
गीली आँखों में अब सूखपन सा छा रहा था ,
आँखे ढूंढ रही थी सूरज की  रोशनी को ,
बेताब थी पलके रात के पल समेटने को ,
किसी की आँखों में आस भर सकूं ,
ख़ामोशी की चारदीवारी में शोर भर सकूं ,
मेरी ईद के रोज़े को इंतज़ार है इफ़्तार का ,
ठहरी हुई ज़िन्दगी को इंतज़ार है रफ़्तार का  ................  

२४ /०६/२०१६ - २ बजे रात 



Poem on zindagi life's , KOSHISH hindi poem BY SUNIL AGRAHARI-कोशिश


 

Published in  Mauritius 
Magazine - Akrosh
February 18

*****कोशिश ***** poem on try , positivity 

पंछियों की तरह झूठ बोले बिना ,
एक दिन तो  रहे आओ कोशिश करें ,

नदियों की तरह पानी खुद ना पिए ,

नीर प्यासों को दे ,आओ कोशिश करें ,


पत्थरों की तरह  हर मज़हब में रहे,

सब को सज़दा करें ,आओ कोशिश करें ,

धूप में खुद दरख़्त ,सब को छाया दिए ,

सब की छाया बने ,आओ कोशिश करें 

याद ईसा को कर ,माफ़ सब को करें ,

माफ़ कर ,माफ़ी मांगे ,आओ कोशिश करें 


घास  के जैसे मिट्टी से जुड़ कर रहें ,

पावँ ज़मी पर रहें ,आओ कोशिश  करें ,   

१८/०६/२०१६ - १२ बजे रात





Tuesday, 14 June 2016

Poem on zindagi , AYA HUN POEM BY SUNIL AGRAHARI - HINDI POEM ON HELPING OTHERS AND POSITIVITY -आया हूँ



****आया हूँ*** 
                                                                                                                   
                                                                                                               
दो कदम तुम चलो ,चार हम भी चले ,
तुमसे कन्धा मिलाने आया हूँ मैं ,

तेरी खुशियों से मुझको मतलब नहीं ,

बांटने तेरे ग़म को आया हूँ मैं ,

मुश्किलें है तेरी ,लड़ना तुझको ही हैं ,

हौसला बस तेरा बढ़ाने आया हूँ मैं ,

 इस जहाँ में ना रो , तन्हा ही तू ,

अश्क को पोछने तेरे,आया हूँ मैं ,

वक्त हो अच्छा तो ,साथ देते है सब ,

 गर्दीशी को निभाने तेरे, आया हूँ मैं ,

वो इन्सां ही क्या ,जिए खुद के लिये ,

 जीने दूजो के खातिर ,  आया हूँ मैं , 
१२/०६/२०१६--- रात २:३० बजे





Poem on zindagi , life's , BEWAJAH POEM BY SUNIL AGRAHARI -hindi poem on without any reason positivity and willingness-बेवजह

     
**** बेवजह****  
                                                                                                            
समझदार बन के , खामोश बैठे हो ,
बेवजह भी कभी मुस्कुराया करो ,

ग़र मतलब हो , घर से बाहर आते हो ,

बेवजह भी कभी निकल आया करो ,

काम की बाते तो हर वक़्त करते हो ,

बेवजह बातें करने भी कभी आया करो ,

ज़रूरत पर ही लोगो से क्यूँ मिलते हो ?

बेवजह भी कभी मिलने आया करो  ,

अपनों से तो गले तुम रोज़ मिलते हो ,

बेवजह के भी रिश्ते कभी निभाया करो ,

होशियार ज़िम्मेदार बड़े बनते हो ,

बेवजह बच्चों संग कभी खेला करो ,

ज़िंदा रहने के खातिर वजह ढूँढते हो ,

बेवजह ज़िन्दगी भी कभी जिया करो ,    १२/०६/२०१६ ---रात 2 बजे 

Poem on mukaddar, kismat, bhagya , ,CHALTA RAHA POEM by sunil agrahari -hindi poem on gambling , life struggle -चलता रहा

       

                                                                                                                 





****चलता रहा****


चाल पे चाल मैं यूँ ही चलता रहा ,
रात को दिन में तब्दील करता रहा,
ज़िन्दगी से जुआ खेलता ही रहा,
दूर बैठा था मुझसे मुकद्दर मेरा ,

वक़्त भी ये माजरा सब देखता रहा ,
खुल के शै , छुप के मात ,मैं चलता रहा ,
पलके बोझिल हुई , पर संभलता रहा ,
अपनी हिम्मत का परा ना गिरने दिया ,

जीतना मुकद्दर को , मेरा मकसद रहा ,
बिसात की चाल को मैं समझाता रहा ,
बिना वक़्त के मैं यूँ ही मात खाता रहा ,
आया वक़्त जब क़रीब ,शै मेरा हो गया ,


वक्त को साथ ले चाल चलता रहा ,
आहिस्ता आहिस्ता मैं जीत के करीब आ गया। 
  ०९/०६/२०१६  ---रात  १ बजे


Hindi kavita adhunikta par ,TARKKI hindi poem by sunil agrahari- on social progress and leaving our culture तरक्क़ी ( तंज़)






****तरक्क़ी ( तंज़)****

                                                                  तरक्की तो रोज़ हम करते जा रहे है,
कच्चे थे जो मकाँ अब पक्के हो रहे है,
छोटी  छोटी जगह पर मीनार बन रहे है ,
छोटे छोटे कमरों  में  सिकुड़ते जा रहे है ,
क्या खूब रोज़ हम तरक्की कर रहे है ,

बड़े बड़े मैदान  छोटे होते जा रहे है ,
घास मिट्टी कम ,पक्के फर्श बन रहे है , 
घास हटा असली , नकली  लगा रहे है,
कच्ची माटी से पैरों के , रिश्ते ख़त्म हो रहे है ,
क्या खूब रोज़ हम तरक्की कर रहे है , 

अपनी भाषा बोलने में शर्म  रहे है  ,
विदेशी भाषा में पी. एच. डी. कर रहे हैं ,
छोड़ अपनी संस्कृति पाश्चात्य  हो रहे है ,
अपनी ही सभ्यता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे है ,
क्या खूब रोज़ हम तरक्की कर रहे है ,

रिश्तों के मायने  ,रोज़ ग़ुम हो रहे है , 
सीमित भावनाओं से ग्रसित हो रहे है ,
बिना मतलब ही जज़्बाती हो रहे है ,
मज़हबी उन्माद से वक़्त सींच रहे है,
क्या खूब रोज़ हम तरक्की कर रहे है,

मिट्टी की सोंधी खुशबू से लोग  दूर हो रहे है ,
मिट्टी के खिलौने बच्चों से दूर हो रहे है ,
इस मिट्टी के खातिर तो केवल जवान मर रहे है ,
इस मिट्टी से जुड़े हुवे किसान मर रहे है ,
क्या खूब रोज़ हम तरक्की कर रहे है....3 
 ०८/०६/२०१६  रात 2 बजे 

poem on modern progress , social issues , tarakki 







Poem on zindagi , rishte , relationship ,GULLAK POEM BY SUNIL AGRAHARI-poem-गुल्लक

                              

  ***गुल्लक ***                                                                             मेरा प्यार का गुल्लक टूट गया,

मेरा सब कुछ जैसे रूठ गया,
उसमे रिश्तों की जमा पाई थी,
जो अन्जाने में मैंने कमाई थी,
छोटी मोटी खुशियों के फुटकर थे उसमें,
बचपन के माता पिता का प्यार था जिसमें,
वो मेरे सबसे अनमोल थे सिक्के,
लड़कपन और दोस्ती वाले मासूम प्यारे सिक्के,
अड़ोस पड़ोस रिश्तेदारों के खट्टे मीठे सिक्के,
वो पहला स्कूल गया था मैं जिसमे,
तोतली ज़ुबाँ से बोला था उनसे,
समझ नहीं पाते थे अध्यापक ,
फिर भी प्यार किया मुझसे ,
वो प्यार जैसे रिश्ते ,खनखन खनकते जैसे सिक्के,
बड़ा हुआ अब मैं हुआ समझदार,
इन रिश्तों के गुल्लक में देखा दरार,
भरा हुआ गुल्लक मेरा टूटा पहली बार,
कच्ची मिट्टी पक कर  टूट हुई जैसे बेकार,
वो सिक्के हो गए खोटे, अब नहीं पुराने बाजार,
जहाँ चले मेरा सिक्का , चले जमा पाई प्यार,
फूटा मेरा गुल्लक, बिखरा मेरा प्यार,
रिश्तों के सिक्कों की इज़्ज़त करो यार ,
पैसे मिल जायेंगे ,पर रिश्ते न मिलेंगे यार ,
रिश्तो के बिना ये दुनियाँ है बेकार ,
रिश्तों के गुल्लक में न आने दो दरार  ........  
१३/०६/२०१६---रात १ बजे