Saturday, 2 July 2016

Poem on zindagi life's , KOSHISH hindi poem BY SUNIL AGRAHARI-कोशिश


 

Published in  Mauritius 
Magazine - Akrosh
February 18

*****कोशिश ***** poem on try , positivity 

पंछियों की तरह झूठ बोले बिना ,
एक दिन तो  रहे आओ कोशिश करें ,

नदियों की तरह पानी खुद ना पिए ,

नीर प्यासों को दे ,आओ कोशिश करें ,


पत्थरों की तरह  हर मज़हब में रहे,

सब को सज़दा करें ,आओ कोशिश करें ,

धूप में खुद दरख़्त ,सब को छाया दिए ,

सब की छाया बने ,आओ कोशिश करें 

याद ईसा को कर ,माफ़ सब को करें ,

माफ़ कर ,माफ़ी मांगे ,आओ कोशिश करें 


घास  के जैसे मिट्टी से जुड़ कर रहें ,

पावँ ज़मी पर रहें ,आओ कोशिश  करें ,   

१८/०६/२०१६ - १२ बजे रात





Tuesday, 14 June 2016

Poem on zindagi , AYA HUN POEM BY SUNIL AGRAHARI - HINDI POEM ON HELPING OTHERS AND POSITIVITY -आया हूँ



****आया हूँ*** 
                                                                                                                   
                                                                                                               
दो कदम तुम चलो ,चार हम भी चले ,
तुमसे कन्धा मिलाने आया हूँ मैं ,

तेरी खुशियों से मुझको मतलब नहीं ,

बांटने तेरे ग़म को आया हूँ मैं ,

मुश्किलें है तेरी ,लड़ना तुझको ही हैं ,

हौसला बस तेरा बढ़ाने आया हूँ मैं ,

 इस जहाँ में ना रो , तन्हा ही तू ,

अश्क को पोछने तेरे,आया हूँ मैं ,

वक्त हो अच्छा तो ,साथ देते है सब ,

 गर्दीशी को निभाने तेरे, आया हूँ मैं ,

वो इन्सां ही क्या ,जिए खुद के लिये ,

 जीने दूजो के खातिर ,  आया हूँ मैं , 
१२/०६/२०१६--- रात २:३० बजे





Poem on zindagi , life's , BEWAJAH POEM BY SUNIL AGRAHARI -hindi poem on without any reason positivity and willingness-बेवजह

     
**** बेवजह****  
                                                                                                            
समझदार बन के , खामोश बैठे हो ,
बेवजह भी कभी मुस्कुराया करो ,

ग़र मतलब हो , घर से बाहर आते हो ,

बेवजह भी कभी निकल आया करो ,

काम की बाते तो हर वक़्त करते हो ,

बेवजह बातें करने भी कभी आया करो ,

ज़रूरत पर ही लोगो से क्यूँ मिलते हो ?

बेवजह भी कभी मिलने आया करो  ,

अपनों से तो गले तुम रोज़ मिलते हो ,

बेवजह के भी रिश्ते कभी निभाया करो ,

होशियार ज़िम्मेदार बड़े बनते हो ,

बेवजह बच्चों संग कभी खेला करो ,

ज़िंदा रहने के खातिर वजह ढूँढते हो ,

बेवजह ज़िन्दगी भी कभी जिया करो ,    १२/०६/२०१६ ---रात 2 बजे 

Poem on mukaddar, kismat, bhagya , ,CHALTA RAHA POEM by sunil agrahari -hindi poem on gambling , life struggle -चलता रहा

       

                                                                                                                 





****चलता रहा****


चाल पे चाल मैं यूँ ही चलता रहा ,
रात को दिन में तब्दील करता रहा,
ज़िन्दगी से जुआ खेलता ही रहा,
दूर बैठा था मुझसे मुकद्दर मेरा ,

वक़्त भी ये माजरा सब देखता रहा ,
खुल के शै , छुप के मात ,मैं चलता रहा ,
पलके बोझिल हुई , पर संभलता रहा ,
अपनी हिम्मत का परा ना गिरने दिया ,

जीतना मुकद्दर को , मेरा मकसद रहा ,
बिसात की चाल को मैं समझाता रहा ,
बिना वक़्त के मैं यूँ ही मात खाता रहा ,
आया वक़्त जब क़रीब ,शै मेरा हो गया ,


वक्त को साथ ले चाल चलता रहा ,
आहिस्ता आहिस्ता मैं जीत के करीब आ गया। 
  ०९/०६/२०१६  ---रात  १ बजे


Hindi kavita adhunikta par ,TARKKI hindi poem by sunil agrahari- on social progress and leaving our culture तरक्क़ी ( तंज़)






****तरक्क़ी ( तंज़)****

                                                                  तरक्की तो रोज़ हम करते जा रहे है,
कच्चे थे जो मकाँ अब पक्के हो रहे है,
छोटी  छोटी जगह पर मीनार बन रहे है ,
छोटे छोटे कमरों  में  सिकुड़ते जा रहे है ,
क्या खूब रोज़ हम तरक्की कर रहे है ,

बड़े बड़े मैदान  छोटे होते जा रहे है ,
घास मिट्टी कम ,पक्के फर्श बन रहे है , 
घास हटा असली , नकली  लगा रहे है,
कच्ची माटी से पैरों के , रिश्ते ख़त्म हो रहे है ,
क्या खूब रोज़ हम तरक्की कर रहे है , 

अपनी भाषा बोलने में शर्म  रहे है  ,
विदेशी भाषा में पी. एच. डी. कर रहे हैं ,
छोड़ अपनी संस्कृति पाश्चात्य  हो रहे है ,
अपनी ही सभ्यता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे है ,
क्या खूब रोज़ हम तरक्की कर रहे है ,

रिश्तों के मायने  ,रोज़ ग़ुम हो रहे है , 
सीमित भावनाओं से ग्रसित हो रहे है ,
बिना मतलब ही जज़्बाती हो रहे है ,
मज़हबी उन्माद से वक़्त सींच रहे है,
क्या खूब रोज़ हम तरक्की कर रहे है,

मिट्टी की सोंधी खुशबू से लोग  दूर हो रहे है ,
मिट्टी के खिलौने बच्चों से दूर हो रहे है ,
इस मिट्टी के खातिर तो केवल जवान मर रहे है ,
इस मिट्टी से जुड़े हुवे किसान मर रहे है ,
क्या खूब रोज़ हम तरक्की कर रहे है....3 
 ०८/०६/२०१६  रात 2 बजे 

poem on modern progress , social issues , tarakki 







Poem on zindagi , rishte , relationship ,GULLAK POEM BY SUNIL AGRAHARI-poem-गुल्लक

                              

  ***गुल्लक ***                                                                             मेरा प्यार का गुल्लक टूट गया,

मेरा सब कुछ जैसे रूठ गया,
उसमे रिश्तों की जमा पाई थी,
जो अन्जाने में मैंने कमाई थी,
छोटी मोटी खुशियों के फुटकर थे उसमें,
बचपन के माता पिता का प्यार था जिसमें,
वो मेरे सबसे अनमोल थे सिक्के,
लड़कपन और दोस्ती वाले मासूम प्यारे सिक्के,
अड़ोस पड़ोस रिश्तेदारों के खट्टे मीठे सिक्के,
वो पहला स्कूल गया था मैं जिसमे,
तोतली ज़ुबाँ से बोला था उनसे,
समझ नहीं पाते थे अध्यापक ,
फिर भी प्यार किया मुझसे ,
वो प्यार जैसे रिश्ते ,खनखन खनकते जैसे सिक्के,
बड़ा हुआ अब मैं हुआ समझदार,
इन रिश्तों के गुल्लक में देखा दरार,
भरा हुआ गुल्लक मेरा टूटा पहली बार,
कच्ची मिट्टी पक कर  टूट हुई जैसे बेकार,
वो सिक्के हो गए खोटे, अब नहीं पुराने बाजार,
जहाँ चले मेरा सिक्का , चले जमा पाई प्यार,
फूटा मेरा गुल्लक, बिखरा मेरा प्यार,
रिश्तों के सिक्कों की इज़्ज़त करो यार ,
पैसे मिल जायेंगे ,पर रिश्ते न मिलेंगे यार ,
रिश्तो के बिना ये दुनियाँ है बेकार ,
रिश्तों के गुल्लक में न आने दो दरार  ........  
१३/०६/२०१६---रात १ बजे






Wednesday, 18 May 2016

Motivational poem, FAITH , FARK POEM BY SUNIL AGARAHARI - फ़र्क

       

******फ़र्क******

बीज में दम  हो तो ,पौधा ज़रूर निकलता है ,
फिर ज़मी बंज़र भी हो तो क्या फ़र्क  पड़ता है ,

आफ़ताब रोज़ दुनियां में कहीं न निकलता है  ,
फिर मुर्गा बांग  दे या नादे , क्या फर पड़ता है ,

हिम्मत से बढ़ो  ख़ुदा ज़रूर मदद करता है ,
फिर मुक़द्दर साथ ना दे ,क्या फ़र्क पड़ता है ,

इन्सां वही जो इंसानियत की इबादत करता है ,
फिर हो  किसी भी धर्म का, क्या फ़र्क पड़ता है ,

ठेस लगती  है कहीं भी तो ,दर्द ज़रूर होता है ,
फिर अमीर हो या गरीब ,क्या फ़र्क पड़ता है ,
  
हर रिश्ते को निभाने में, क़ुर्बान होना पड़ता है ,
फिर अपना हो या पराया , क्या फ़र्क पड़ता है , 

२४/०४/ २०१६ 


Tuesday, 29 March 2016

Social problem hindi poem , dharm jaati ,KUY BADE HUEY POEM BY SUNIL AGRAHARI , Poem on Religion-क्यूँ बड़े हुवे


**क्यूँ बड़े हुवे **१६/०३/२०१६ 
छोटे ही ठीक थे , क्यों हम बड़े हो गए ,
जात और धर्म से कोई यारी ना थी ,
प्यार से , खेल ,खाने ,से बस मतलब था,
सियासत की कोई मारा मारी  न थी ,
जब चाहे मंदिर मस्जिद में  आना ,
बेहिचक गुरूद्वारे में घुस जाना ,
हो कोई नाराज़ तो कोने में घुस जाना ,
मार खाई फिर भी ना रुक आना जाना ,
क्यों की  ...... 
सियासत से महरूम था, वो वो बचपन का ज़माना ,

क़ाज़ी मुल्ला होली के रंग में दीखते थे ,
पंडित जी ईद मुबारक कहते ना  थकते थे ,
क्रिसमस पर सेन्टा बन सरदार जी निकलते थे ,
केक संग गुजिया सिवइयों में मिलते थे ,
सब के त्योहारों में मस्ती हम करते थे ,
इक दूजे से मिलने का इंतज़ार हम करते थे ,
क्यों की  .... 
हम सियासत के बारे में ना जानते थे ,

बड़े होते ही जाने कैसी पढाई आ गई ,
केक गुजिया सिवई में जुदाई आ गई ,
त्योहारों से कोई खुश , कहीं मनहूसियत छा गई ,
इंसान के इन्सानियत को सियासत खा गई ,
सियासत की कोई सीमा न रह गई ,
दुनियां में सब से ऊपर सियासत हो गई ,
क्यों  की  .... 
सब को सियासत की नज़र लग गई , 



गुलाल रंग अबीर का अब भी वही है ,
ईद की नमाज़ और अज़ान वही है ,
गुरूद्वारे चर्च में , प्रार्थना वही है ,
क्रिसमस वाले सेंटा  का, रंग लाल  वही है ,
लोहड़ी में ढोल भांगड़े का , ताल वही है ,
मासूम बचपना की , मासूमियत वही  है ,
क्यों की  .....
डर  सियासत का इनको नहीं है ,



कुदरती नियम है हम बड़े हो गए 
सियासत के हाथो मज़बूर हो गए ,
बचपन की दोस्ती में बैर हो गए ,
बचपने से अपने  हम  दूर हो गए ,
संग जिनके खेला कूदा वो गैर हो गए ,
कौमी सियासत में हम चूर हो गए ,
शर्म आती है हम क्यों बड़े हो गए   ............. 
क्यों  की  .... 
सियासती मुर्दे जो अब खड़े हो गए ,
बस 
सियासत ने इंसान को कुछ ऐसा तोड़ा,  
इंसान  को इंसान के लायक न छोड़ा,
नफरती सियासत है बेलगाम घोड़ा,
इंसानियत से सियासत को लगाओ कोड़ा ....... 

सुनील अग्रहरि 
एल्कॉन इंटरनेशल स्कूल 
मयूर विहार -फेस -1 
मोबाइल -08802203750 












Samajik , dharm , jaati , social problem AI KHUDA POEM BY SUNIL AGRAHARI- Poem Religion -ऐ ख़ुदा

  

*****ऐ ख़ुदा ***** जनवरी २०१६ 

तू कहाँ है ऐ परवरदिगार , ज़रा देख ले अपने बन्दों को ,
तेरे खातिर मर मिट मार रहे ,समझा इन धर्म के अन्धो को ,

जब सारे धर्म एक से है , सब की शिक्षा एक सी है ,
सब की बुनियादें एक सी है , फिर क्यों इनमे भेद  है ?

तेरे नाम का  है जो ठेकेदार , वो  बात बात पर ऐंठा  है ,
उन बन्दों की ले ज़रा खैर खबर , किस जहाँ में जा तू बैठा है ,

ऐ खुदाओं सारी दुनियाँ के , क्यों चुप से तमाशा देख रहे ,
क्या तेरी है इसमें  रज़ा  , सब तेरी मन्शा देख रहे ,

इक बार ज़मीं पर आ जाओ , कह दो धरम सब एक है ,
जंग ना कर मेरे खातिर , हम सारे खुदा भी एक से है ,

Monday, 25 January 2016

Jai guru ji KAISE KAHUN -JAI GURU JI BY SUNIL AGRAHAR- कैसे कहूँ










*****कैसे कहूँ***** 

कैसे कहूँ गुरु जी सब को है तेरी ज़रूरत ,
गुरु बिन न ज्ञान होव , इक तू ही सच की मूरत ,

ईश्वर की माया नगरी ,किस अर्थ हम है आये ,
अज्ञानी हम अधूरे ,गुरु जी तुम हो ज्ञान पूरक ,

मेरा दिन उदय होता , गुरु जी का नाम ले कर ,
आँखे विश्राम करती , गुरु जी का नाम ले कर ,

रस्ता विहीन मैं  हूँ  , सद मार्ग  तुम सुझा दो,
आशीष अमृत दे दो , मृग तृष्णा  को बुझा दो ,

अनजान इस जहाँ में , किस पर करे भरोसा ,
तेरी चरण शरण मिल जाये ,काँटे भी लगे फूलों सा 

चित शान्त कर दो मेरा, मोह माया पाश तोड़ो ,
गुरु भक्ति दान दे दो ,मेरा भोले से नाता जोड़ो ,

२६/०१ /२०१६  (गुरु जी)  

Wednesday, 13 January 2016

GAREEB POEM BY SUNIL AGRAHARI- POEM ON POOR PEOPLE-ग़रीब

 

मारीशश - प्रकाशित 
पत्रिका - आक्रोश 
दिसंबर 2020 

***ग़रीब***(कटाक्ष ) ८ /०१/२०१६ 


कहने की बात है गरीब भी एक दिन अमीर होगा ,
गरीब के अमीर होते ही वहाँ दूसरा गरीब खड़ा होगा ,
सारी दुनियाँ में सब से ज्यादा गरीब ही बिकता है ,
कटा फटा नंगा बिना पैकिंग के ही बिकता है ,
फटे कपड़े की खिड़कियों से उसका अंग झांकता है , 
अमीरों की आँखों में वो मनोरंजन सा दिखता है ,
सच बोलूं तो गरीबों को कोई मदद भी नहीं करता है ,
कोरे वादों की गोली खा के गरीब ही मरता है, 
ग़रीब आगे बढ़ने  की जब भी कोशिश करता है ,
शीशमहल वालों की आँखों में चुभता है ,
ऐ गरीब तू वादा कर ,जब तू अमीर होगा ,
ग़रीबों की मदद करने में तू सब से करीब होगा ,
शिक्षा और हौसले  का हथियार इनको देगा ,
तभी रक्तबीज सा ग़रीबी का अन्त होगा। ........  














Monday, 11 January 2016

Pyar muhabbat ki kavita ,GUJARISH -POEM BY SUNIL AGRAHARI -गुज़ारिश


*******गुज़ारिश *******१०/०१/२०१६ 

इक अदद होश में आने की गुज़ारिश की थी ,
वो तो बस मुझसे खामखाँ नाराज़ हुवे।

नज़रअंदाज़ न कर प्यार , गुजारिश की थी ,
थोड़ा मुस्काया फिर, खामखाँ नाराज़ हुवे।

हुस्न पे न कर तू अब गुरुर , गुजारिश की थी ,
अक्स देख आइना में ,खामखाँ नाराज़ हुवे।

उम्र पहरा पे रख , उनसे गुजारिश की थी ,
घूरा नज़रों से मुझे ,खामखाँ नाराज़ हुवे।

ख्वाहिश बेपर्दा करदे  मुझसे ,गुजारिश की थी ,
शर्म से पर्दा गिरा ,खामखाँ नाराज़ हुवे।

न कर हावी इश्क ,पे हुस्न ,गुजारिश की थी ,
दबा सुर्ख होठों को ,खामखाँ नाराज़ हुवे।

ख्वाब में न दस्तक देना , गुजारिश की थी ,
सुन मेरी इल्तज़ा वो  ,खामखाँ नाराज़ हुवे।

न करो जुल्म सितम ,दिल पे ,गुजारिश की थी ,
प्यार न छुपा सके वो ,खामखाँ नाराज़ हुवे।


JAI GURU JI BHAJAN BY SUNIL AGRAHARI -गुरु जी










********गुरु जी*******७ /०१/२०१६ 
गुरु जी सदा सहाय ,
भोले शंकर तुझमे समाय ,
गुरु नाम सिमरता जाय ,
गुरु जी नमः शिवाय ,

इक बार जो भी आया ,
तेरे दर पे ज़रा झुकाया ,
आशीष तेरा पाया ,
दुःख का हुवा सफाया ,

तुम्हे भक्त अपने प्यारे 
नित देते दर्शन प्यारे ,
जीवन अब तेरे सहारे ,
सारे कष्ट तुझसे हारे ,

कोई कमी न रहती ,
जिसपर तेरी कृपा बरसती ,
रहमत से झोली भरती ,
दामन में खुशियाँ खिलती ,

तेरा नाम ज़ुबान पे आये ,
कोई मुश्किल कभी न आये, 
तेरा नाम जो गुनगुनाये ,
जीवन सुख संगीत पाये    

बिगड़ी बनाने वाले ,
अपनी शरण बुला ले ,
भव सागर से बचा ले ,
अब तू ही सब सम्भाले   ....... सुनील अग्रहरि 

Wednesday, 4 November 2015

Poem on zindagi , jiwan BACHPANA POEM BY SUNIL AGRAHARI - POEM ON CHILDHOOD -बचपना

******बचपना****** ०५/११/२०१५

हार्दिक आभार आदरणीय सुनीता राजीव जी को ,इस कविता की प्रेरणा स्रोत बनने के लिए। 

उम्र ना वापस मिली किसी को ,
जीवन की सच्चाई है ,
कुछ तो बचपना जी लेने दो  ,
बचपन की  याद आई है,
कुछ तो बचपना जी ....... 

देख गुब्बारे मेले में ,
बचपन फिरकी सा याद आया ,
आज फिर गुब्बारे से खेलने दो ,
मुझे शर्म हया ना आई है ,
कुछ तो बचपना जी ....... 

गली के पास छोटी सी दुकान ,
दस पैसे में टॉफी दो चार ,
चूस चबा कर खाने को ,
जुबां मेरी ललचाई है ,
कुछ तो बचपना जी ....... 

अपनी मिठाई छुपा कर खाना ,
बहन का हिस्सा चुरा कर खाना ,
फिर चाट मलाई खाने को ,
बचपन ने ली अंगड़ाई है ,
कुछ तो बचपना जी ....... 

स्कूल के बाहर चूरन खाना ,
चलते दौड़ते लंगड़ी  लगाना ,
फिर नंगे पैर दौड़ लगाने को ,
बचपन ने  याद दिलाई है ,
कुछ तो बचपना जी ....... 


छोटी सी बात पे आंसू बहाना ,
माँ के अंचल में छुप जाना ,
माँ बाप की शिक्षा याद करूँगा ,
जो बचपने में मुझे सिखाई है ,
कुछ तो बचपना जी ....... 



Sunday, 1 November 2015

Poem on bewafai , VARNA HINDI POEM - POEM ON TRUST - SUNIL AGRAHARI

 

*****वर्ना *****३० /१०/२०१५ 

ना करो दिल से वफ़ा की दुआ ,
वर्ना पाओगे बेवफाई ही ,

प्यार तो होता है जुदा होकर ,
वर्ना मिलना तो रस्मअदाई ही ,

जिस्म का चैनों सुकून आग में बसा ,
वर्ना ठंडक  तो है सच्चाई  ही ,

इश्क़ करना तो बस हुनर समझो ,
वर्ना है भरोसा आजमाइश ही ,

जारी रखना इश्क में हंसना ,
वर्ना आम है इश्क़ में रुलाई ही ,

क्यूँ तड़पता है न तड़प प्यार में ऐ दिल ,
वर्ना मिलती  है , तन्हाई  ही ,


Poem on bewafai , KAH GAYA HINDI POEM ,कह गया SUNIL AGRAHARI


***कह गया ***३०/१०/२०१५/

दिल की खामोशियाँ कह रही 
दर्द का परिन्दा उड़ गया ,

दिल का अखबार कह रहा ,
चर्चा तेरे नाम का जुड़ गया ,

लहू का उबाल कह रहा ,
दिल का ग़ुबार रहा गया ,

इप्तदा इबादत की कह रही 
बुत वो ख़ुदा सी गढ़ गया 

नम आँखों से अब्र कह रहा ,
आश्ना बिन मिले ही बढ़ गया ,

इश्क़ की खलिश दिल से कह रही 
वो तो जुर्माना दिल पे मढ़ गया ,

ग़ुबार ----धुंध 
इप्तदा ---शुरुआत 
इबादत---पूजा 
अब्र ---बादल 
आश्ना ---दोस्त 
खलिश ---चुभन 


Tuesday, 27 October 2015

Hindi kavita rishto par , SAGEY PARAYE HINDI POEM ,सगे पराये - POEM ON RELATIONSHIP

      
*****सगे पराये ***** १९/१०/२०१५ 


रिश्तों की आँधी में अपने पराए हिल गए,
अपने तो ग़ुम , बस पराये ही मिल गए ,

जज़्बाती आँसुओं में अपने ही बह गए ,
पराये ही थे अब तक दिल में जो रह गए ,

उम्मीद  की चाशनी तो अपने चाट गए ,
चालाकी से बड़ी ,अपने पराये कर गए ,

मेरे घर में अपने मेरी इज़्ज़त उतार गए ,
ज़ुबान से नश्तर बन के क़त्ल कर गए ,

हम निवाला हम प्याला वो सब से कह गए,
मुखौटा अपनेपन का  संग उधार ले गए,  





Hindi kavita zindagi ki ,AKELEY HI HINDI POEM अकेल ही - POEM ON LONELINESS

 

               

        ***अकेल ही **२०/१०/२०१५

क्यों ज़रूरी है किसी का होना ,
आये जब दुनियाँ में अकेले ही ,

   दर्द में क्यूँ तू सहारा ढूँढे ,
सहना जब दर्द को अकेले ही ,

न कर इन्तज़ार काफ़िले का तू ,
जब सफर मौत का अकेले ही ,

ना मचा शोर ज़िन्दगी में कभी ,
दफ्न ख़ामोश जब अकेले ही ,

ऐ ख़ुदा तू बता संग किसके रहूँ ,
 साया बिन स्याह में जब अकेले ही ,

Thursday, 15 October 2015

Hindi kavita pyar par , KHWAHISH HINDI POEM, ख्वाहिश, SUNIL AGRAHARI


******ख्वाहिश ******१६/१०/२०१५ 


दिल तड़प की सुरंग में भटकता रहा ,
कि नरम  धूप की  रौशनी बन आओगे ,

दिल इंतज़ार के  दलदल में धसंता  रहा ,
की प्यार की डोर बन दिल खींच  लाओगे ,

ख्वाहिश दिल की रही मुट्ठी भर आसमाँ 
की तरह प्यार दे कर तुम समां जाओगे ,

दिल की धड़कन का शोर टूटा दरवाज़ा सा 
की प्यार से ज़र्ज़र धड़कन रोक पाओगे ,

प्यार को  तेरे चाह  से जाने क्या रंज़ है  
की प्यार को इश्क़ करना सीखा पाओगे 

Tuesday, 13 October 2015

Poem on politics , SIYASAT MAUT KI HINDI POEM,सियासत मौत की - poem on bad politics by sunil agrahari


PUBLISHED IN JANKARI KAAL DELHI MAGAZINE MAY22
******सियासत मौत की******(कटाक्ष)१४/१०/२०१५  


ऐ बुज़दिल मौत के सौदागर ,

तू कफ़न के रंग में रहता है , 
क्यूँ मौत की लीला रचता है  
लाशों पे सियासत करता है , 
ऐ बुज़दिल मौत के सौदागर ..... 

ग़म के दरिया का पानी  

तू पी कर प्यास बुझाता है  
खून से लथपथ लाशों से  
मज़हब बदनाम करता है , 
ऐ बुज़दिल मौत के सौदागर ..... 

इस ज़िन्दादिल  दुनियाँ में ,

तू लाशे पैदा करता  है , 
सोच है तेरी कब्रिस्तान ,
तू खुद को ख़ुदा समझता है 
ऐ बुज़दिल मौत के सौदागर ..... 

लहू उबाल के जनता का 

सरे आम कत्ल करवाता है , 
संगीत सुनाता मातम का ,
शमसान सी राह दिखाता है,
ऐ बुज़दिल मौत के सौदागर .....   

चीर कलेजा अपना तू ,

हिम्मत है तो सच बतला  ,
तेरी ज़ुबाँ लहू  हो जाएगी  
जिससे तू मौत बाँटता है ,
ऐ बुज़दिल मौत के सौदागर ..... 





Sunday, 11 October 2015

Poem on zindagi , life's , KAI BAAR HINDI POEM कई बार - poem on sometimes by sunil agrahari

******कई बार ******९ /१०/२०१५ 


यूँ अँधेरे को ऐसे ना इल्ज़ाम दो ,
लोग उजाले में भी तो भटक जाते है ,

मुफलिसी पे ना तू ऐसे आंसू बहा ,
दौलतमन्द भी भिखारी बहुत होते है ,

कोस कर यूँ मुकद्दर को पायेगा क्या ,
हौसले से मुकद्दर बदल जाते है ,

दूसरों को ग़लत कह के खुद ना बचो ,
खुदबखुद भी तो लोग बहक जाते है ,

ये ज़रूरी नहीं अपनों में अपना हो ,
कई बार ग़ैर भी  अपने बन जाते है ,




Poem on happiness , CHALO CHALEY HINDI POEM चलो चलें - chalo chale hindi poem by sunil agrahari

******चलो चलें ******१२/१०/२००१५ 

चल बग़ीचे गुलों संग बातें करे ,
बहोत दिन हुए खिलखिलाए हुए,

चलो आज खेलें बच्चों के संग ,
मुद्दतोँ से लड़कपन है भूले हुए ,

चलो  भीड़ से आज बाहर चलें ,
बीते दिन कितने खुद संग बैठे हुए ,

चलो आज बचपन की गलियां चले ,
वक़्त बीता बहोत खुद को ढूढ़ें हुए ,

चलो आज दुश्मन के घर चलते है ,
नए दोस्त बनाये बहोत दिन हुए ,

मौत ही है दवा ,चैन से सोने को ,
रात बरसों हुवे ढंग से सोये हुए ,














Monday, 5 October 2015

HINDI POEM on PYAAR प्यार-Poem on love , affection , relation by sunil agrahari



          **** प्यार ***२/१०/२०१५ 

  प्यार पराया करता है , या अपनों से जुड़ता है ,
रिश्तों का रूप अनोखा है , ये मिलता बंटता  रहता है ,

कोई प्यार में जान लेता है ,कोई प्यार से जान देता है,
चाहे अनचाहे रिश्तों में , अपना पराया होता है ,

प्यार में  है फरमाइशें ,मिलन जुदाई की ख्वाहिशें,
ऐतबार ,मुकद्दर रिश्तों का ,सिमटना बिखरना होता है,

सूरत सीरत के रिश्तों में , शबनम भी तराशे जाते है ,
इक ठेस उम्र है  प्यार की , फिर ये कहीं ना टिकता है ,

प्यार में खून का रिश्ता नहीं,ये तो नज़र का धोखा है,
प्यार से  खून हारता है ,प्यार ही खून का रिश्ता है ,

Monday, 28 September 2015

Poem on politics ,NAA KARO SIYAST HINDI POEM ,ना करो सियासत-(व्यंग्य )- poem on bad politics by sunil agarahari

     

 

PUBLISHED-JANKARIKAAL MAGAZIN - MARCH 2022
 

****ना करो सियासत ****(व्यंग्य )२९/०९/२०१५ 



ऐ श्वेत वस्त्र धारी प्राणी ,श्यामल से कार्य तुम्हारे है ,
ईश्वर भी घबरा के कहे ,ना करो सियासत नेता जी ,

बेरंग पानी को रंग दिया ,और हवा की साँसे घुटने लगी ,
गड्ढे की मिट्टी तुझसे कहे ,ना करो सियासत नेता जी ,

सब्ज़ी संग रोटी  कैसे रहे ,महंगाई की आंत सुलगती है,
बोर में बन्द प्याज कहे ,ना करो सियासत नेता जी ,

जात धरम में बैर करा ,इन्सां से इन्सां लड़वाया ,
घबरा कर पार्टी झण्डा कहे ,ना करो सियासत नेता जी ,

छीन नेवाला जनता का,अपने ही उदर को तृप्त किया ,
भीगा सड़ा अनाज़ कहे ,ना करो सियासत नेता जी ,

ज़ीरो भी हीरो बन जाता ,जिस पर भी तेरी कृपा हुंई ,
अय्याशी त्राहिमाम तुझसे कहे,ना करो सियासत नेता जी ,

भस्मासुर की  तुझपे कृपा,तूने जिसे छुआ वो भस्म हुवा, 
डर भस्मासुर की भसम कहे ,ना करो सियासतनेता जी ,








Monday, 21 September 2015

Poem on zindagi life's , NAZARIYA HINDI POEM ,नज़रिया- poem on nazariya , HINDI POEM ON VIEWS by sunil agrahari

   

           

………   नज़रिया  २१ /०९/१५ ………… 

वो ज़लील  फैसले ही थे  की 
बेक़सूर आँखे छलक पड़ी

कुछ अजीब सी थी मजबूरियां ,
की खामोश थी ज़ुबान पड़ी ,

दौलत की अन्धी उनकी नज़र 
सच्चाई पर न नज़र पड़ी ,

बेअक्ल पर न जाया करो 
तेरी आसुओं की है इज़्ज़त बड़ी ,

वो गुलाम है अब तक गुरुर के 
तुम मुस्कुराती मुश्किल में खड़ी ,

ना गुमान  कर  तू ऐ रहनुमां 
इस जहाँ में सब की है इक घड़ी ,



Friday, 18 September 2015

HINDI POEM UMMID PAR -उम्मीद - hindi poem on hope , HINDI POEM ON EXPECTATIONS by sunil agrahari





 …उम्मीद  … १९ /०९/२०१५  

मुझे उनसे कितनी उम्मीद थी 
उन्हें मुझसे कितनी शिकायतें ,

दिलों दिल में मुझसे खफा रहे 
रहा पूछता उनसे मैं खैरियतें 

यूँ ही कशमकश में ही रह गए 
न वो सुन सके मेरी आहटें ,

थोड़ी इल्म की ही कसर रही 
वर्ना हो रही होती मुहब्बते ,

मेरे दिल में ऐसे बसे है वो 
जैसे कुरान की हो आयतें 

Monday, 14 September 2015

INDEPENDENCE DAY hindi poem , REPUBLIC DAY , AAZAADI -आज़ादी ?- hindi poem on freedom , INDEPENDENCE DAY , REPUBLIC DAY by sunil agrahari

………आज़ादी ?...........१४/०९/२०१५ 



वक्त हो गणतंत्र दिवस या हो स्वतन्त्रता दिवस ,
हर चौराहे की लाल बत्ती पर,तिरंगा बिकता है बेबस ,
अमीरी से आज़ाद मुफलिसी के ग़ुलाम , 
बच्चे बूढ़े और जवान ,
भूखी ज़िंदगी, हाथ तिरंगा ले कर ,
गुजारते है दिन , झंडा  बेच कर,

ये है बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर ,
दिल में चुभती है जैसे बन के तीर , 
इन्हे देख आभास होता है ऐसे  ,  
कुछ ही लोग आज़ाद हुए थे 
अंग्रेजो की गुलामी से  जैसे,

ये ग़ुलाम तब भी थे , ये ग़ुलाम आज भी है 
अंग्रेजो को तिरंगा बेचा जिसने,
वो गद्दार अमीर आज भी है ,लेकिन 
आज भी चौराहे पे ये भूखे गरीबहै ,
ये नागरिक भी तो देश के करीब है ,


अंग्रेजो से आज़ाद हुवे,तो गुलाम हुवे सामजिक पिछड़ेपन  से ,
एक दूसरे को हलाल कर रहे आरक्षण की छुरी से ,
ये कैसी आज़ादी , कैसा सामाजिक ढाँचा ?
कैसा नियम कानून ,कैसा क़ानूनी साँचा ?
ये है आज़ादी पे भरपूर करारा तमाचा ,
चौराहे पे तिरंगा नहीं , बिक रहा है ज़मीर , 
है राजनीत ज़िम्मेदार ,फरेबी और अमीर ,
ये स्याह रंग आज़ादी का, कब चमकेगा अबीर ?
ये देख नीर आँखों में ले कोने में रो रहा कबीर ………………… 




Tuesday, 1 September 2015

Substitution song- for school teachers by sunil agrahari

     Substitution song-- 02/09/2015


please sing like song "i am a disco dancer "


आई एम ए substi मास्टर---पोपोपोपो --2
ज़िंदगी मेरी substi ,जान है मेरी substi,
तो झूमो, तो नाचो, मेरे संग नाचो गाओ , आई एम ए substi मास्टर ---पोपोपोपो
                            Music
जब मै स्कूल मे adhok पे आया था  , तब भी मै substi लेता था
एक्टिविटी teachers ,को आता न कुछ भी , ,ये भी मै सुनता रहता था ,
ये मस्ती करते है , गाते बजाते इनको ही दो duty, इनको ही दो sabsti ,
पो पो पो ssss फिर भी substi ले ले यार
पो पो पो ssss न मन कर खराब 
तो झूमो तो नाचो substi ले के नाचो गाओ
                             Music
साइन्स के period मे science teacher on duty, हिन्दी teacher substi है लेता,पो पो पो पो
Syllabus complete यू तो, होता नहीं यारो, substi मे टाइम बर्बाद होता , पो पो पो पो
8 पीरियड मे रोज़ ,बच्चों के 1,2 पीरियड substi मे बर्बाद होता ,
हाँ हाँ हाँ तू रेमेडियल ले ले यार ,न नन्न न ज्यादा सोच यार ,
तो झूमो तो नाचो substi ले के नाचो गाओ , आई एम ए substi मास्टर ---पोपोपोपो
                              Music

स्कूल मे गर ,खुश रहना चाहो तो , हर रोज़ lo एक दो substi , पो पो पो पो
वैसे तो मंडी मे सब्ज़ी बहोत मंहगी , पर सस्ती मिलती है substi , पो पो पो पो
खाने मे सब्ज़ी चाहे न खाओ तुम , पर time से रोज़ लो substi, पो पो पो पो

साँसो मे sabsti है ,धड़कन मे substi है , जीना ही substi है मरना ही substi है
हाँ हाँ हाँ मत substi छोड़ यार ,
Substi का मारा , ये सिस्टम है बेकार,
न छोड़ो ,तुम दौड़ो ,दौड़ धूप के substi ले ले  
आई एम ए substi मास्टर---पोपोपोपो --2







MAN KI YATAR FOR DHL INFRA BULLS ,मन की यात्रा

          
                 






मन की यात्रा   9/2/15      


मन की यात्रा , के संग , तन की यात्रा ,
तन संग यात्रा ,कर लो,मन की  यात्रा ,


आसान सफर कर देते ,
देते सुख रैन बसेरा ,
दुनियाँ के हर कोने मे ,
संबन्धो का है डेरा ,

हर पल हर दम साथ रहे
न किसी बात का फेरा 
मन की अनंत इक्षाओ का 
होता है यही सवेरा  

जीवन मे रंग भर लो , बढ़ा लो, सुख की मात्रा 

मन की यात्रा , के संग , तन की यात्रा 

Wednesday, 19 August 2015

JAGO GRAHAK JAGO HINDI POEM , जागो ग्राहक जागो- CONSUMER FORUM AWARENESS SONG IN HINDI

      





…… ग्राहक जागो.......२०/०८/२०१५ 


मत भूलो हक़ माँगों ग्राहक 
जागो ग्राहक जागो 
असली नकली को पहचानो 
जागो ग्राहक जागो 
मत भूलो हक़ माँगों ग्राहक    …………

हर खरीद की पक्की रसीद 
मत लेना तुम भूलो 
isi  मार्क  देख  लो 
तभी सामान खरीदो 
मत भूलो हक़ माँगों ग्राहक   ...................

एक्सपायरी डेट चेक करो 
सारे खाद्य  पदार्थ में 
तुरंत कभी  विश्वास करो न 
दूकानदार की मीठी बातों में 
मत भूलो हक़ माँगों ग्राहक  ...................


फ़र्ज़ी ठग नक्कालों से 
हरदम रहो तुम सावधान 
इनकी करो शिकायत कोर्ट में 
कन्ज़्यूमर कोर्ट  में है प्रावधान 
मत भूलो हक़ माँगों ग्राहक  ...................